
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। जनपद की कसया तहसील इन दिनों किसी सरकारी कार्यालय से ज्यादा “रसूखदारों के सुरक्षित अड्डे” के रूप में चर्चा में है। यहां शासन के आदेशों की नहीं, बल्कि पकड़ और पहुंच की ताकत चलती दिखाई दे रही है। तहसील में वर्षों से जमे लेखपाल राधेश्याम सिंह को लेकर उठ रहे सवाल अब सीधे प्रशासनिक निष्पक्षता पर तमाचा बन चुके हैं।

आरोप है कि शासन स्तर से स्थानांतरण आदेश जारी होने के बावजूद लेखपाल साहब का कसया तहसील से मोहभंग नहीं हुआ। आदेश आया, पत्रक जारी हुआ, तारीख तय हुई, लेकिन कुर्सी आज भी जस की तस है। इससे बड़ा सवाल यह है कि आखिर आदेश कमजोर पड़ गया या फिर आदेश से ऊपर कोई और ताकत काम कर रही है?
मामले को और भी दिलचस्प बनाती है वह चर्चा, जो तहसील परिसर से लेकर गांव की चौपाल तक गूंज रही है। बताया जा रहा है कि राधेश्याम सिंह की बेटी और दामाद भी उसी कसया तहसील में लेखपाल पद पर तैनात हैं। यानी तहसील प्रशासन अब सरकारी व्यवस्था कम और “पारिवारिक व्यवस्था” ज्यादा दिखाई देने लगा है। लोग तंज कस रहे हैं कि कहीं आने वाले दिनों में तहसील का बोर्ड बदलकर “राधेश्याम एंड फैमिली प्राइवेट लिमिटेड” न लिखना पड़ जाए।
सूत्रों के अनुसार वर्ष 2025 में शासन स्तर से राधेश्याम सिंह का स्थानांतरण कसया से तमकुहीराज तहसील के लिए कर दिया गया था। अपर जिलाधिकारी द्वारा 25 जून 2025 को जारी पत्रक संख्या 1468(4) में साफ आदेश था कि नवंबर 2025 तक उन्हें रोका जाए, लेकिन उसके बाद हर हाल में कार्यमुक्त किया जाए। आदेश में यह भी स्पष्ट लिखा गया कि नवंबर 2025 के पश्चात उन्हें तमकुहीराज तहसील के लिए रिलीव किया जाएगा।
लेकिन प्रशासनिक फाइलों में दर्ज यह आदेश अब सवालों के कटघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है। क्योंकि नवंबर बीत गया, कैलेंडर बदल गया, लेकिन लेखपाल साहब की कुर्सी नहीं बदली। तहसील में चर्चा है कि प्रभावशाली संरक्षण और अंदरूनी सेटिंग के दम पर ट्रांसफर आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
सबसे बड़ा कटाक्ष तो व्यवस्था पर यही है कि आम कर्मचारी को आदेश मिलते ही तत्काल रिलीव कर दिया जाता है, लेकिन रसूखदारों के लिए नियम शायद अलग किताब में लिखे जाते हैं। अब जनता पूछ रही है कि आखिर शासन बड़ा है या संरक्षण?
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। देखना होगा कि कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी फाइलों की धूल में दफन होकर रह जाएगा।
