
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
डुमरिया मठ की जमीन पर ‘काला खेल’ का आरोप, हाईकोर्ट तक गूंजा मामला
कुशीनगर। यूपी-बिहार सीमा पर स्थित प्राचीन डुमरिया मठ इन दिनों जमीन, राजस्व अभिलेखों और प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर उठे गंभीर सवालों के कारण सुर्खियों में है। धर्म और आस्था से जुड़े इस विवाद ने अब ऐसा रूप ले लिया है कि मामला गांव की चौपाल से निकलकर हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है। आरोप इतने गंभीर हैं कि पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर सरकारी अभिलेखों और मौके की जमीन में इतना बड़ा अंतर कैसे हो गया?

मठ के महंथ रूद्रानंद गिरी ने प्रशासनिक तंत्र पर सीधा सवाल खड़ा करते हुए आरोप लगाया है कि गांव में कब्रिस्तान की भूमि सरकारी रिकॉर्ड में मात्र 48 डिसमिल दर्ज है, जबकि मौके पर लगभग 100 डिसमिल जमीन पर कब्जा कर लिया गया है। महंथ का कहना है कि यह सिर्फ जमीन का विवाद नहीं, बल्कि धार्मिक संपत्तियों को धीरे-धीरे खत्म करने की सुनियोजित कोशिश है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्षों से राजस्व अभिलेखों में हेरफेर कर वास्तविक स्थिति को बदलने का खेल चलता रहा और अब मामला बेहद संवेदनशील हो चुका है।
महंथ रूद्रानंद गिरी का कहना है कि डुमरिया मठ केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर भी है। ऐसे में यदि सरकारी दस्तावेजों के जरिए जमीन की स्थिति बदली जा रही है तो यह सिर्फ मठ का नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की विरासत पर खतरा माना जाएगा। यही वजह है कि उन्होंने पूरे प्रकरण को हाईकोर्ट तक पहुंचाया, जहां फिलहाल मामला विचाराधीन बताया जा रहा है।
मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया जब महंथ ने मंडलायुक्त गोरखपुर से मठ की ऐतिहासिक एवं धार्मिक प्रमाणिकता की जांच पुरातत्व विभाग से कराने की मांग की। सूत्रों के मुताबिक मंडलायुक्त के निर्देश पर जिलाधिकारी कुशीनगर ने जांच के आदेश भी जारी किए, लेकिन हैरानी की बात यह बताई जा रही है कि महीनों बाद भी फाइल तहसीलदार तमकुहीराज कार्यालय से आगे नहीं बढ़ सकी। आरोप है कि करीब तीन से चार महीने से जांच की प्रक्रिया ठंडे बस्ते में पड़ी हुई है।
यहीं से प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल और तेज हो गए हैं। स्थानीय लोगों के बीच चर्चा आम है कि आखिर ऐसा कौन-सा दबाव है, जिसके कारण इतने संवेदनशील मामले में प्रशासनिक मशीनरी सुस्त दिखाई दे रही है? ग्रामीणों का कहना है कि जब मामला धर्म, आस्था और सरकारी अभिलेखों से जुड़ा हो, तब कार्रवाई में देरी कई तरह के संदेह पैदा करती है। गांव के लोगों का आरोप है कि यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो कहीं ऐसा न हो कि कागजों का खेल असली जमीन की तस्वीर ही बदल दे।
मठ पक्ष का आरोप है कि विरोधी पक्ष कथित रूप से कागजों में फेरबदल कर जमीन की वास्तविक स्थिति को प्रभावित करने की कोशिश में जुटा हुआ है। यही कारण है कि अब इस विवाद को लेकर सामाजिक और राजनीतिक हलकों में भी हलचल तेज हो गई है। कई लोगों का मानना है कि यदि राजस्व अभिलेखों, खतौनी, नक्शा और मौके की जमीन का निष्पक्ष मिलान कराया जाए तो बड़े खुलासे सामने आ सकते हैं।
गांव में लोग कटाक्ष करते हुए यह भी कहते नजर आ रहे हैं कि “फाइलें शायद खुद चलकर जांच नहीं करतीं, उन्हें आगे बढ़ाने के लिए इच्छाशक्ति भी चाहिए।” वहीं कुछ ग्रामीणों का कहना है कि यदि आम आदमी का छोटा-सा मामला होता तो प्रशासन तुरंत सक्रिय दिखाई देता, लेकिन जैसे ही मामला बड़ी जमीन और प्रभावशाली पक्षों से जुड़ता है, सरकारी फाइलों की रफ्तार अचानक धीमी पड़ जाती है।

फिलहाल पूरा मामला प्रशासन, राजस्व विभाग और हाईकोर्ट की अगली कार्रवाई पर टिका हुआ है। डुमरिया मठ से जुड़े लोग निष्पक्ष जांच और सच्चाई सामने आने की मांग कर रहे हैं। वहीं क्षेत्र में यह चर्चा लगातार गर्म है कि अगर जमीन और अभिलेखों के इस कथित “काले खेल” की परतें खुलीं, तो कई चेहरे बेनकाब हो सकते हैं।
