
पास के नाम पर सेटिंग, सरकार को हर महीने करोड़ों की चोट
बिना आईएसटीपी ट्रकों की एंट्री ने खोली सिस्टम की पोल
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। बिहार सीमा से सटे उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में मोरंग और बालू के कथित अवैध कारोबार को लेकर अब जो चर्चाएं सामने आ रही हैं, उन्होंने पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कहा जा रहा है कि यह खेल सिर्फ सड़कों पर दौड़ती ट्रकों का नहीं, बल्कि मोबाइल फोन के भीतर पल रहे एक ऐसे “डिजिटल नेटवर्क” का है, जो बॉर्डर से लेकर थाना क्षेत्रों तक ट्रकों को “ग्रीन कॉरिडोर” उपलब्ध कराता रहा।
चर्चा-ए-सरेआम है कि यदि इस पूरे मामले में कथित इंट्री ऑपरेटरों, खनन विभाग के जिम्मेदार कर्मचारियों, चालक जितेंद्र, मुंशी सतीश और संबंधित थाना क्षेत्रों में तैनात कुछ पुलिसकर्मियों के मोबाइल फोन की निष्पक्ष फॉरेंसिक जांच हो जाए, तो करोड़ों की राजस्व चोरी का ऐसा सच सामने आ सकता है, जिससे पूरा सिस्टम हिल सकता है।

सूत्रों का दावा है कि बिना आईएसटीपी ट्रकों की एंट्री कोई छोटा-मोटा खेल नहीं था, बल्कि यह एक “संगठित डिजिटल सिंडिकेट” की तरह संचालित हो रहा था। ट्रक बिहार से निकलती थी और मोबाइल फोन की घंटियां यूपी बॉर्डर तक गूंजने लगती थीं। किस रास्ते से ट्रक जाएगी, कहां चेकिंग सख्त है, किस चौकी पर कौन ड्यूटी में है, किसे फोन करना है, किसे “सेट” करना है और किस ट्रक को किस थाना क्षेत्र से सुरक्षित निकालना है — यह पूरा खेल कथित तौर पर मोबाइल नेटवर्क के जरिए संचालित होने की चर्चा है।
बॉर्डर पर चेकिंग, अंदर “ग्रीन सिग्नल”!
स्थानीय लोगों का कहना है कि बॉर्डर पर कई बार सिर्फ दिखावे की कार्रवाई होती थी। कुछ ट्रकों को रोककर माहौल बनाया जाता था, जबकि जिनकी “लाइन सेट” होती थी, वह बिना आईएसटीपी के भी बेखौफ आगे निकल जाती थीं। यही कारण है कि जब बहादुरपुर चौकी पर सघन जांच की खबरें सुर्खियों में थीं, उसी समय कई ट्रकें तमकुहीराज, सेवरही और पटहेरवा क्षेत्र की सड़कों पर फर्राटा भरती दिखाई दे रही थीं।
अब सवाल उठता है कि आखिर वह कौन-सा अदृश्य नेटवर्क था, जो सीमा से लेकर अंदरूनी थाना क्षेत्रों तक ट्रकों को सुरक्षित रास्ता उपलब्ध करा रहा था? क्या यह सब बिना विभागीय संरक्षण के संभव था?
लोग कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि “जहां सिस्टम सोता है, वहां मोबाइल जागता है।” अब यही मोबाइल फोन पूरे खेल का सबसे बड़ा गवाह बताया जा रहा है।

कॉल डिटेल में छिपा करोड़ों का सच?
जानकारों का कहना है कि यदि जांच एजेंसियां सिर्फ पिछले एक महीने का कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), लोकेशन हिस्ट्री और चैट बैकअप खंगाल लें, तो कई बड़े चेहरे बेनकाब हो सकते हैं।
कौन किस समय किस अधिकारी के संपर्क में था? ट्रक पकड़े जाने से पहले और बाद में किन नंबरों पर बातचीत हुई? किन थाना क्षेत्रों में आरोपी और विभागीय कर्मचारी बार-बार एक साथ मौजूद मिले? यह सब तकनीकी जांच से सामने आ सकता है।
सूत्र बताते हैं कि कुछ कथित इंट्री ऑपरेटरों की बातचीत विभागीय कर्मचारियों और थाना क्षेत्रों के कुछ जिम्मेदार लोगों से नियमित रूप से होने की चर्चा है। यदि यह बातें तकनीकी जांच में सही साबित हुईं, तो मामला केवल अवैध खनन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि “संरक्षित राजस्व चोरी” के बड़े नेटवर्क में तब्दील हो सकता है।
ड्राइवर और मुंशी की भूमिका पर सबसे ज्यादा चर्चा
पूरे मामले में खनन विभाग के चालक जितेंद्र और मुंशी सतीश का नाम इलाके में तेजी से चर्चा में है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि विभाग के अंदर और बाहर के लोगों के बीच संपर्क का सबसे बड़ा माध्यम यही दोनों थे।
ट्रक कब निकलेगी, कहां रोकी जाएगी, किसे छोड़ना है, किसे पकड़ना है, किस थाना क्षेत्र में “मैनेजमेंट” मजबूत है — ऐसी सूचनाओं का आदान-प्रदान इन्हीं के जरिए होने की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि इन दोनों के मोबाइल फोन की फॉरेंसिक जांच हो जाए, तो पूरा खेल मिनट-दर-मिनट सामने आ सकता है। कौन-कौन नंबर लगातार संपर्क में थे, किस समय कौन-सी लोकेशन सक्रिय थी और किन घंटों में संदिग्ध गतिविधियां हुईं — यह सब जांच की दिशा बदल सकता है।
मुकदमे के बाद भी सक्रिय रहे आरोपी?
सबसे बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि जिन लोगों पर मुकदमे दर्ज हुए, क्या वह मुकदमे के बाद भी पुलिस और विभागीय लोगों के संपर्क में रहे?
चर्चा है कि कुछ आरोपी कार्रवाई के बाद भी संबंधित थाना क्षेत्रों में खुलेआम घूमते और जिम्मेदार लोगों से मिलते देखे गए। यदि यह सही है, तो सवाल यह भी उठता है कि क्या कार्रवाई सिर्फ दिखावे के लिए की गई? क्या छोटे लोगों को पकड़कर असली नेटवर्क को बचाने की कोशिश हो रही है?
लोगों का कहना है कि यदि जांच निष्पक्ष हुई, तो सिर्फ ट्रकों के नंबर नहीं, बल्कि “सिस्टम के नंबर” भी सामने आ सकते हैं।
एसपी के एक्शन के बाद सिस्टम में खलबली
तरया सुजान थानाध्यक्ष और बहादुरपुर चौकी प्रभारी के निलंबन के बाद पुलिस महकमे में हलचल तेज बताई जा रही है। चर्चा है कि पुलिस अधीक्षक केशव कुमार के सख्त तेवर के बाद अब कई लोग पुराने मोबाइल बदलने, चैट डिलीट करने और संपर्कों को मिटाने में जुट गए हैं।
सूत्रों का दावा है कि यदि जांच एजेंसियों ने डिजिटल एविडेंस को गंभीरता से लिया, तो मामला केवल अवैध ट्रक एंट्री तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पुलिस, खनन विभाग और कथित इंट्री नेटवर्क के बीच संबंधों की पूरी तस्वीर सामने आ सकती है।
अब देखना यह है कि कार्रवाई सिर्फ छोटी मछलियों तक सीमित रहती है या फिर मोबाइल डेटा की परतें उन बड़े चेहरों तक भी पहुंचती हैं, जिन पर संरक्षण देने के आरोप लग रहे हैं।
आखिर क्या होता है आईएसटीपी?
जानकार बताते हैं कि जब कोई खनिज पदार्थ — जैसे बालू, मोरंग या गिट्टी — एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जाया जाता है, तो उसके लिए खनन विभाग द्वारा जारी वैध ट्रांजिट पास अनिवार्य होता है। इसी पास को आईएसटीपी कहा जाता है।
यह पास सुनिश्चित करता है कि खनिज वैध रूप से खनन किया गया है और सरकार को मिलने वाली रॉयल्टी व टैक्स जमा हुआ है। आईएसटीपी को अवैध खनन और राजस्व चोरी रोकने का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है।
आमतौर पर इस पास में वाहन नंबर, खनिज का प्रकार, मात्रा, खदान का नाम, गंतव्य स्थान, वैधता अवधि और ऑनलाइन ट्रांजिट नंबर या क्यूआर कोड जैसी जानकारी दर्ज होती है।
यदि कोई ट्रक बिना आईएसटीपी के दूसरे राज्य में प्रवेश करते हुए पकड़ी जाती है, तो उस पर भारी जुर्माना, वाहन सीज करने की कार्रवाई, राजस्व वसूली और संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज करने का प्रावधान है।
“मोबाइल का जिन्न” क्या खोलेगा पूरा राज?
स्थानीय लोग अब खुलकर कह रहे हैं कि सरकार यदि सच में राजस्व चोरी रोकना चाहती है, तो सिर्फ ट्रक पकड़ने से कुछ नहीं होगा। असली खेल मोबाइल फोन के भीतर छिपा है।
जिस दिन कॉल डिटेल, लोकेशन हिस्ट्री और चैट रिकॉर्ड की परतें खुलेंगी, उस दिन बालू सिंडिकेट का ऐसा सच सामने आ सकता है, जो पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर देगा।
फिलहाल जिले में एक ही चर्चा है —
“ट्रक सड़क पर चल रही थी, लेकिन खेल मोबाइल में हो रहा था।”
