

लखनऊ/कुशीनगर। उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्राम पंचायतों को लेकर बड़ा प्रशासनिक फैसला लेते हुए प्रदेशभर की पंचायत राजनीति में हलचल मचा दी है। शासन के नए आदेश के अनुसार ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद अब मौजूदा ग्राम प्रधान अपनी पंचायतों में “प्रशासक” की भूमिका निभाएंगे, लेकिन उनके अधिकारों पर कड़ी लगाम भी लगा दी गई है। शासन ने साफ कर दिया है कि अब बिना जिलाधिकारी की मंजूरी कोई नया कार्य शुरू नहीं होगा।
पंचायतीराज अनुभाग-3 द्वारा जारी शासनादेश के मुताबिक प्रदेश की ग्राम पंचायतों के सामान्य निर्वाचन 2026 के बाद नई पंचायतों की पहली बैठक होने तक अथवा अधिकतम छह माह की अवधि तक वर्तमान ग्राम प्रधानों को ग्राम पंचायतों में प्रशासक के रूप में नामित किया जाएगा। यह व्यवस्था 27 मई 2026 से प्रभावी मानी जाएगी।
सरकार ने इस आदेश में प्रशासनिक नियंत्रण को पहले से कहीं ज्यादा सख्त कर दिया है। निर्देशों के अनुसार प्रशासक केवल सामान्य और रूटीन कार्य ही कर सकेंगे। कोई भी बड़ा या नीति से जुड़ा फैसला लेने की खुली छूट नहीं होगी। यदि किसी पंचायत में अत्यावश्यक परिस्थिति पैदा होती है तो प्रस्ताव पहले जिला पंचायत राज अधिकारी के माध्यम से जिलाधिकारी के समक्ष भेजना होगा, जिसके बाद ही अनुमति मिल सकेगी।
इतना ही नहीं, शासन ने विकास कार्यों पर भी “ब्रेक सिस्टम” लगा दिया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि प्रशासक बनने से पहले स्वीकृत, निर्माणाधीन, पूर्ण या भुगतान योग्य कार्यों का भुगतान पहले की तरह कराया जा सकेगा, लेकिन प्रशासक नियुक्त होने के बाद किसी भी नए विकास कार्य को शुरू करने से पहले जिलाधिकारी की अनुमति अनिवार्य होगी।
जिन ग्राम पंचायतों में पहले से प्रशासनिक समिति काम कर रही है या जहां प्रधान का पद रिक्त है, वहां सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) को प्रशासक बनाया जाएगा। वहीं केंद्र या राज्य सरकार की नई योजनाओं अथवा आयोग की संस्तुतियों को लागू करने के लिए भी सीधे फैसला नहीं लिया जा सकेगा। इसके लिए भी प्रस्ताव को प्रशासनिक मंजूरी की लंबी प्रक्रिया से गुजरना होगा।
शासन के इस फैसले को पंचायत व्यवस्था में “सत्ता नियंत्रण मॉडल” के रूप में देखा जा रहा है। एक तरफ सरकार पारदर्शिता और जवाबदेही का संदेश देने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ पंचायत स्तर पर विकास कार्यों की रफ्तार और प्रशासनिक स्वतंत्रता को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं। अब निगाहें जिलाधिकारियों की भूमिका और पंचायतों में इस नई व्यवस्था के असर पर टिक गई हैं।
