

विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर/लखनऊ। उत्तर प्रदेश की ग्राम पंचायतों में लंबे समय से चल रही प्रशासनिक असमंजस की स्थिति पर आखिरकार शासन ने बड़ा फैसला ले लिया है। जिन ग्राम पंचायतों में प्रधान की मृत्यु, इस्तीफा, अयोग्यता या अन्य कारणों से प्रधान का पद रिक्त पड़ा है, वहां अब “बिना मुखिया की पंचायत” का दौर नहीं चलेगा। शासन ने साफ आदेश जारी कर दिया है कि ऐसी ग्राम पंचायतों में सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) यानी एडीओ पंचायत को प्रशासक बनाया जाएगा।
पंचायती राज विभाग द्वारा जारी कार्यालय ज्ञाप ने साफ कर दिया है कि ग्राम पंचायतों के सामान्य निर्वाचन 2026 के बाद नई पंचायतों के गठन तक प्रशासनिक मशीनरी को रुकने नहीं दिया जाएगा। जहां प्रधान नहीं, वहां अब फाइलें धूल नहीं खाएंगी और न ही विकास कार्य “निर्णय के इंतजार” में दम तोड़ेंगे।
दरअसल, कई ग्राम पंचायतों में प्रधान का पद खाली होने के बाद विकास योजनाएं, भुगतान, सफाई, सार्वजनिक कार्य और पंचायत से जुड़े जरूरी प्रशासनिक फैसले प्रभावित हो रहे थे। कहीं अधिकार को लेकर भ्रम था तो कहीं पंचायतें मानो “ऑटो मोड” पर चल रही थीं। शासन के ताजा आदेश को इसी प्रशासनिक शून्यता पर सीधा प्रहार माना जा रहा है।
कार्यालय ज्ञाप के मुताबिक, जिन पंचायतों में पहले से कोई प्रशासनिक समिति गठित नहीं है अथवा प्रधान का पद रिक्त है, वहां एडीओ पंचायत को प्रशासक की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। हालांकि शासन ने यहां भी नियंत्रण की मजबूत लाइन खींच दी है। नियमित और आवश्यक कार्य तो प्रशासक कर सकेंगे, लेकिन कोई नया विकास कार्य, नई योजना, बड़ा वित्तीय निर्णय या विशेष खर्च जिलाधिकारी की स्वीकृति के बिना नहीं होगा।
साफ है कि शासन ने “अधिकार” भी दिया है और “लगाम” भी अपने हाथ में रखी है।
प्रशासनिक हलकों में इस आदेश को व्यवस्था बचाने वाला कदम माना जा रहा है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इसे लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे पंचायत व्यवस्था को पटरी पर लाने वाला फैसला बता रहे हैं, तो कुछ सवाल उठा रहे हैं कि क्या अब गांवों की सरकार सीधे अफसरशाही के नियंत्रण में चलेगी?
कटाक्ष यह भी है कि जिन पंचायतों में जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि नहीं है, वहां अब “बाबूशाही मॉडल” से गांव का पहिया घुमाया जाएगा। हालांकि शासन का तर्क साफ है—विकास कार्य रुकना नहीं चाहिए, प्रशासनिक व्यवस्था टूटनी नहीं चाहिए और ग्राम पंचायतें नेतृत्व के अभाव में अराजकता का शिकार नहीं बननी चाहिए।
राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से यह आदेश बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाले दिनों में इसका सीधा असर उन ग्राम पंचायतों पर दिखाई देगा जहां लंबे समय से नेतृत्व का संकट बना हुआ है। अब देखने वाली बात यह होगी कि एडीओ पंचायत की नई भूमिका गांवों में विकास की रफ्तार बढ़ाती है या फिर पंचायतों में अफसरशाही बनाम जनप्रतिनिधित्व की नई बहस को जन्म देती है।
