
“मंशा बताइए…” सवाल पूछने पर सचिव का जवाब बना चर्चा का विषय
प्रधान बोले – “हम अधिकारियों से बात कर लेंगे…”
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी 15वें वित्त आयोग योजना के तहत गांवों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लगाए जा रहे आरओ प्लांट अब सवालों के घेरे में आते दिखाई दे रहे हैं। विशुनपुरा विकास खण्ड के ग्राम सभा मनीकौरा में स्थापित किये जा रहे एक आरओ प्लांट को लेकर ग्रामीणों ने गंभीर वित्तीय अनियमितता, घटिया निर्माण और भुगतान प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी के आरोप लगाए हैं। गांव में यह मामला अब चर्चा, सवाल और नाराजगी का विषय बना हुआ है।
ग्रामीणों और स्थानीय लोगों के अनुसार लगभग साढ़े चार लाख रुपये की अनुमानित लागत से तैयार कराये जा रहे इस आरओ प्लांट का कार्य अभी पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुआ है, इसके बावजूद लाखों रुपये के भुगतान की चर्चा ने लोगों को हैरान कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि जब जमीन पर कार्य अधूरा दिखाई दे रहा है तो आखिर भुगतान की फाइल किस आधार पर आगे बढ़ी?
ग्राउंड स्तर पर की गयी पड़ताल और स्थानीय लोगों से हुई बातचीत में कई तरह के सवाल सामने आये। ग्रामीणों का दावा है कि ग्राम सचिवालय परिसर में लगाये जा रहे आरओ प्लांट के नीचे तैयार चबूतरे में निम्न गुणवत्ता की सामग्री के इस्तेमाल की आशंका दिखाई देती है। मौके पर एक छोटा चबूतरा, साधारण मशीन, स्थानीय स्तर की टाइल्स और सुरक्षा के नाम पर प्लाई का घेरा दिखाई देता है। कुछ ग्रामीणों का कहना है कि मौके पर जो कार्य नजर आ रहा है, उसकी लागत भुगतान राशि की तुलना में काफी कम प्रतीत होती है।
यही कारण है कि गांव में अब यह चर्चा तेज है कि आखिर वास्तविक लागत क्या है, कितना भुगतान हुआ और किस प्रक्रिया के तहत हुआ?

पूरा काम नहीं, फिर भुगतान कैसे?
ग्रामीणों द्वारा उठाया जा रहा सबसे बड़ा सवाल भुगतान प्रक्रिया को लेकर है। सामान्यतः 15वें वित्त आयोग की योजनाओं में भुगतान से पहले तकनीकी प्रक्रिया पूरी किये जाने की बात कही जाती है। इसमें निरीक्षण, माप पुस्तिका (एमबी), फोटो, जियो टैगिंग, गुणवत्ता परीक्षण और संबंधित अधिकारियों की प्रक्रिया शामिल होती है।
लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि मनीकौरा में कार्य पूरा होने से पहले ही लगभग 3 लाख 66 हजार रुपये तक भुगतान किये जाने की चर्चा है। यदि ऐसा हुआ है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सभी औपचारिकताएं पूरी हुई थीं? क्या तकनीकी सत्यापन हुआ? क्या निरीक्षण रिपोर्ट तैयार हुई? क्या गुणवत्ता की जांच की गयी?
इन सवालों के जवाब अब गांव ही नहीं बल्कि विभागीय व्यवस्था पर भी सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं।
प्रधान का बयान बना चर्चा का विषय
मामले को लेकर जब ग्राम प्रधान नंदलाल साहनी से सवाल किया गया तो उनके कथित बयान की गांव में खूब चर्चा होने लगी। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है और अधिकारियों से बात कर ली जाएगी। उन्होंने भुगतान को “रनिंग पेमेंट” बताया और कहा कि बाकी पैसा बाद में मिलेगा।
प्रधान के इस बयान के बाद गांव में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गयीं। कुछ लोगों का कहना है कि सरकारी योजनाओं में नियम और प्रक्रिया सर्वोपरि होनी चाहिए, जबकि कुछ लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या योजनाओं का संचालन अब तकनीकी प्रक्रिया से ज्यादा प्रभाव और संपर्क के भरोसे होने लगा है?
हालांकि प्रधान पक्ष की ओर से यह भी कहा गया कि कार्य प्रगति पर है और निर्धारित प्रक्रिया के तहत काम कराया जा रहा है।
“बजट से क्या मतलब?” सचिव के कथित जवाब पर उठे सवाल
मामले में उस समय और चर्चा बढ़ गयी जब ग्राम सचिव से बजट और खर्च को लेकर सवाल पूछे जाने की बात सामने आई। ग्रामीणों के अनुसार पूछे गये सवालों के जवाब में सचिव द्वारा “आप अपनी मंशा बताइए” जैसे शब्द कहे गये, जिसने पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि किसी सार्वजनिक योजना में बजट, लागत और भुगतान से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं तो उसका स्पष्ट जवाब मिलना चाहिए, क्योंकि सरकारी धन जनता के हित में खर्च किया जाता है।
बताया जाता है कि सचिव पक्ष की ओर से यह भी कहा गया कि जितना पैसा निकला है, उसके अनुरूप कार्य हुआ है और आवश्यकता पड़ने पर आगे प्रस्ताव के माध्यम से बजट बढ़ाया जा सकता है।
इसी बयान के बाद गांव में यह सवाल और तेज हो गया कि आखिर वास्तविक स्थिति क्या है? क्या कार्य भुगतान के अनुरूप है? क्या तकनीकी मानकों का पालन हुआ है?
ग्रामीणों के आरोपों ने खड़े किये कई बड़े सवाल
मनीकौरा का आरओ प्लांट अब सिर्फ एक निर्माण कार्य नहीं बल्कि कई प्रशासनिक सवालों का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है।
ग्रामीण पूछ रहे हैं—
यदि कार्य अधूरा है तो भुगतान किस आधार पर हुआ?
एमबी किस अधिकारी द्वारा तैयार की गयी?
जियो टैगिंग और गुणवत्ता सत्यापन कब हुआ?
वास्तविक लागत और भुगतान में अंतर की चर्चा क्यों हो रही है?
क्या संबंधित विभाग इस पूरे मामले की जांच करेगा?
इन सवालों के जवाब आने तक गांव में संदेह और चर्चा का माहौल बना हुआ है।
कागजों में विकास या जमीन पर सवाल?
गांवों में आरओ प्लांट लगाने का उद्देश्य साफ है—लोगों को स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना, जलजनित बीमारियों को कम करना और ग्रामीण जीवन को बेहतर बनाना। लेकिन जब ऐसी योजनाओं पर सवाल उठने लगें तो स्वाभाविक रूप से लोगों का भरोसा प्रभावित होता है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो सरकारी योजनाओं पर आम जनता का विश्वास कमजोर हो सकता है। लोगों की मांग है कि पूरे मामले की तकनीकी जांच करायी जाये, भुगतान, लागत, गुणवत्ता और प्रक्रिया की समीक्षा हो तथा जो भी तथ्य सामने आएं उन्हें सार्वजनिक किया जाये।
अब नजर जिला प्रशासन और संबंधित विभागों की ओर है। क्या आरोपों और सवालों की निष्पक्ष जांच होगी? क्या भुगतान और निर्माण की स्थिति का सत्यापन कराया जाएगा? या फिर यह मामला भी गांव की चर्चाओं तक सीमित रह जाएगा?
फिलहाल मनीकौरा का आरओ प्लांट गांव में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है और लोग जवाब का इंतजार कर रहे हैं।
