
नर्गिस की मौत पर उठे सवाल, कार्रवाई के नाम पर सिर्फ इंतजार; पीड़ित परिवार न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर
विशेष संवाददाता, विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर
कुशीनगर जनपद के कसया स्थित लूना हॉस्पिटल में पित्त की थैली के ऑपरेशन के दौरान हुई नर्गिस खातून की मौत का मामला अब केवल एक चिकित्सकीय घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल बनता जा रहा है। घटना को तीन सप्ताह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद जिम्मेदार विभागों की खामोशी लोगों के बीच चर्चा और संदेह दोनों को जन्म दे रही है।
मृतका के पति मोहम्मद तसनीम कौसर द्वारा जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और मुख्य चिकित्सा अधिकारी को दिए गए लिखित प्रार्थना पत्रों में गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतों में ऑपरेशन प्रक्रिया की पारदर्शिता, चिकित्सकों की उपलब्धता, अस्पताल प्रबंधन की भूमिका और आयुष्मान भारत योजना के तहत हुए कथित क्लेम की जांच की मांग की गई है। लेकिन अब तक किसी ठोस कार्रवाई अथवा जांच की स्थिति सार्वजनिक न होने से पीड़ित परिवार खुद को ठगा महसूस कर रहा है।
परिजनों का आरोप है कि ऑपरेशन के दौरान विशेषज्ञ सर्जन की मौजूदगी को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई थी। उनका कहना है कि एक तरफ डॉक्टर के आने की बात कही जा रही थी, वहीं दूसरी ओर मरीज को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया। यदि यह आरोप सही हैं तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि मरीज की सुरक्षा से खिलवाड़ का मामला भी बन सकता है।
मामले को और गंभीर बनाता है आयुष्मान भारत योजना से जुड़ा कथित वित्तीय विवाद। परिजनों का दावा है कि अस्पताल द्वारा उपचार के नाम पर धनराशि ली गई, जबकि बाद में योजना के तहत क्लेम किए जाने की बात सामने आई। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर वास्तविक भुगतान प्रक्रिया क्या रही और इसकी जांच अब तक किस स्तर पर पहुंची?
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि शिकायतों के बावजूद क्या अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड सुरक्षित किए गए? क्या ऑपरेशन से जुड़े चिकित्सकों और स्टाफ से पूछताछ हुई? क्या सीसीटीवी फुटेज को संरक्षित किया गया? क्या प्रथम दृष्टया जांच में कोई जिम्मेदारी तय हुई? यदि नहीं, तो आखिर प्रशासन किस रिपोर्ट या आदेश का इंतजार कर रहा है?
नर्गिस खातून की मौत ने एक परिवार से उसकी दुनिया छीन ली, लेकिन उससे भी अधिक पीड़ादायक है न्याय की राह में दिखाई दे रही सुस्ती। हर आवेदन के साथ परिवार को उम्मीद मिलती है और हर बीतते दिन के साथ वह उम्मीद कमजोर पड़ती जा रही है।
जनपद में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि किसी सरकारी अस्पताल में ऐसी घटना हुई होती तो अब तक कई स्तरों पर जवाबदेही तय हो चुकी होती। ऐसे में लूना हॉस्पिटल प्रकरण में कार्रवाई की धीमी रफ्तार प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर रही है।
फिलहाल पूरा जनपद एक ही सवाल पूछ रहा है—नर्गिस की मौत की सच्चाई सामने कब आएगी और दोषियों पर कार्रवाई कब होगी? क्योंकि न्याय में देरी, कई बार न्याय से वंचित करने के बराबर मानी जाती है।
