

विशेष संवाददाता, विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर
कुशीनगर में बिजली विभाग से जुड़ी कथित भर्ती अनियमितताओं का मामला लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। आउटसोर्सिंग के माध्यम से कम्प्यूटर ऑपरेटरों की नियुक्ति में गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आने के बाद भी जांच की दिशा में कोई ठोस कदम न उठाए जाने से सवाल और गहरे होते जा रहे हैं। जिले के बेरोजगार युवा, अभ्यर्थी और आम नागरिक अब यह जानना चाहते हैं कि आखिर इस पूरे मामले में सच्चाई क्या है और जिम्मेदार अधिकारी अब तक मौन क्यों हैं?
मामला उस समय सुर्खियों में आया जब मीडिया रिपोर्टों में यह आरोप सामने आया कि बिजली विभाग में आउटसोर्सिंग कम्पनी के माध्यम से की गई कम्प्यूटर ऑपरेटरों की भर्ती में न तो कोई सार्वजनिक विज्ञापन जारी किया गया और न ही चयन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया गया। आरोप यह भी लगाए गए कि कुछ अभ्यर्थियों से नियुक्ति के नाम पर भारी धनराशि वसूली गई। हालांकि इन आरोपों की अब तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप हुआ तो संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे?
भर्ती प्रक्रिया को लेकर विभागीय चुप्पी ने पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। आमतौर पर किसी भी सरकारी विभाग से जुड़े ऐसे गंभीर आरोप सामने आने पर प्रारंभिक जांच के आदेश दिए जाते हैं, लेकिन यहां कई दिन बीत जाने के बाद भी न तो कोई जांच समिति गठित होने की सूचना सामने आई है और न ही किसी जिम्मेदार अधिकारी ने सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट की है।
युवाओं का कहना है कि जिले में हजारों योग्य और शिक्षित बेरोजगार रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। यदि वास्तव में कम्प्यूटर ऑपरेटरों के पदों पर भर्ती होनी थी तो इसकी जानकारी सार्वजनिक मंचों पर क्यों नहीं दी गई? आवेदन प्रक्रिया क्या थी? कितने लोगों ने आवेदन किया? चयन का आधार क्या रहा? इन सवालों के जवाब अभी भी धुंध में हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि चयनित अभ्यर्थियों की सूची, मेरिट का आधार, विज्ञापन की प्रति और चयन समिति से जुड़ी जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है। पारदर्शिता की कमी ही उन आशंकाओं को जन्म दे रही है, जिनके कारण भर्ती प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ गई है। जानकारों का मानना है कि यदि विभाग दस्तावेज सार्वजनिक कर दे तो स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है।
इधर जिले में यह चर्चा भी तेज है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि सच सामने आ सके। यदि आरोप निराधार हैं तो उन्हें तथ्यों के साथ खारिज किया जाए और यदि कहीं अनियमितता हुई है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिजली विभाग में आउटसोर्सिंग कम्प्यूटर ऑपरेटरों की भर्ती का विज्ञापन कब और कहां प्रकाशित हुआ था? आवेदन कितने आए थे? चयन समिति में कौन-कौन शामिल था? मेरिट सूची कहां है? और सबसे महत्वपूर्ण—खबरों में मामला उजागर होने के बाद भी जांच शुरू क्यों नहीं हुई?

जब तक इन सवालों के स्पष्ट और दस्तावेजी जवाब सामने नहीं आते, तब तक भर्ती प्रक्रिया पर उठ रहे संदेह खत्म होना मुश्किल है। जिले के हजारों बेरोजगार युवाओं की निगाहें अब प्रशासन और विभागीय अधिकारियों पर टिकी हैं। उन्हें इंतजार है कि सच सामने आए और व्यवस्था पर जनता का विश्वास कायम रहे।
