
बाल पकड़कर घसीटती दिखी महिला, कैमरे में कैद हुई कार्रवाई या संवेदनाओं की हत्या?
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। जंगल पचरुखिया में ट्रक हादसे के बाद शुरू हुआ विवाद अब उस मुकाम पर पहुंच गया है जहां पूरा घटनाक्रम एक वायरल वीडियो के सामने बौना पड़ता दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे वीडियो में पुलिसकर्मी एक महिला को बाल और हाथ पकड़कर खींचते हुए दिखाई दे रहे हैं। यही दृश्य अब जनपद भर में चर्चा, आक्रोश और सवालों का सबसे बड़ा कारण बन गया है।
जिस खाकी को कानून का संरक्षक माना जाता है, वही खाकी जब एक महिला को सार्वजनिक रूप से इस तरह खींचती हुई दिखाई दे तो सवाल केवल कार्रवाई पर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की संवेदनशीलता पर खड़े होते हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि महिला कोई हथियारबंद अपराधी नहीं थी, न ही वह पुलिस पर हमला करती दिखाई दे रही थी। ऐसे में उसके साथ अपनाया गया यह तरीका आखिर किस नियम पुस्तिका का हिस्सा था?
वायरल वीडियो ने पुलिस विभाग के उस चेहरे को सामने ला दिया है जिसे आमतौर पर सरकारी बयानबाजी और प्रेस नोटों की परतों में छिपा दिया जाता है। कैमरा बंद होता तो शायद यह भी एक सामान्य कार्रवाई बताकर फाइलों में दफन कर दी जाती, लेकिन कैमरे ने जो देखा, वह अब जनता भी देख रही है।
ग्रामीणों का आरोप है कि हादसे के बाद पुलिस का पूरा जोर दोषियों की तलाश से अधिक गांव में दबाव बनाने पर रहा। घर-घर दबिश, पूछताछ और कार्रवाई की चर्चाएं पहले से थीं, लेकिन वायरल वीडियो ने उन आरोपों को नई ताकत दे दी है। गांव में अब चर्चा ट्रक हादसे की नहीं, बल्कि महिला के साथ हुए कथित व्यवहार की हो रही है।
प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि कानून की शक्ति और मनमानी की शक्ति में बहुत बड़ा अंतर होता है। पुलिस को कार्रवाई का अधिकार है, लेकिन किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने का अधिकार किसी कानून ने नहीं दिया है। यही वजह है कि वीडियो सामने आने के बाद लोग पूछ रहे हैं कि क्या मौके पर महिला पुलिसकर्मी मौजूद थी? यदि थी तो फिर पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा इस प्रकार की कार्रवाई क्यों की गई? और यदि नहीं थी तो क्या नियमों का पालन किया गया?
सबसे बड़ा सवाल अब पुलिस विभाग की जवाबदेही पर खड़ा है। क्या वरिष्ठ अधिकारी वायरल वीडियो का संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच कराएंगे? क्या वीडियो में दिखाई दे रहे पुलिसकर्मियों की भूमिका तय होगी? क्या महिला के सम्मान से जुड़े इस मामले में कोई जवाबदेही सुनिश्चित होगी या फिर मामला समय के साथ ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
जनता के बीच यह धारणा तेजी से बन रही है कि खाकी की असली परीक्षा अपराधियों से लड़ने में नहीं, बल्कि कानून लागू करते समय संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करने में है। यदि जनता के मन में पुलिस की छवि धूमिल होती है तो उसका असर केवल एक घटना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर पड़ता है।
जंगल पचरुखिया का यह वायरल वीडियो अब केवल एक वीडियो नहीं, बल्कि प्रशासन, पुलिस व्यवस्था और महिला सम्मान के बीच खड़े उस सवाल का प्रतीक बन गया है जिसका जवाब पूरा जिला मांग रहा है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले को महज एक वायरल वीडियो मानता है या फिर जनता की चिंताओं को गंभीरता से लेकर जवाबदेही तय करता है।
