
कुशीनगर। (विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता)।
नगर पालिका परिषद कुशीनगर के वार्ड नंबर 19 शिवाजीनगर स्थित छठ घाट पर कराए गए निर्माण और सौंदर्यीकरण कार्य को लेकर अब सवालों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है। सार्वजनिक धन से तैयार इस परियोजना के स्थल पर सूचना पट्ट तो लगा है, लेकिन निर्माण की वास्तविक लागत का स्पष्ट उल्लेख नजर नहीं आता। बोर्ड पर नाम और पद दिखाई दे रहे हैं, मगर वह आंकड़ा गायब है, जिसके आधार पर जनता यह जान सके कि आखिर सरकारी खजाने से इस काम पर कितनी धनराशि स्वीकृत और खर्च की गई।
यही वजह है कि शिवाजीनगर छठ घाट का निर्माण अब केवल विकास कार्य नहीं, बल्कि पारदर्शिता, खर्च और गुणवत्ता से जुड़े सवालों का केंद्र बन गया है। स्थानीय स्तर पर परियोजना की लागत को लेकर अलग-अलग चर्चाएं हैं। कहीं करीब 55 लाख रुपये की बात कही जा रही है तो कहीं 65 लाख और 90 लाख रुपये तक के आंकड़े सामने आ रहे हैं। हालांकि इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि वास्तविक स्वीकृत लागत कितनी है?
सूचना पट्ट पर नाम, लेकिन खर्च का हिसाब कहां?
निर्माण स्थल पर लगे सूचना पट्ट पर नगर पालिका परिषद कुशीनगर और राज्य वित्त आयोग से संबंधित जानकारी तथा जनप्रतिनिधियों के नाम दर्ज होने की बात सामने आई है। लेकिन परियोजना की कुल स्वीकृत धनराशि, कार्य की विस्तृत तकनीकी जानकारी और अन्य महत्वपूर्ण विवरणों को लेकर स्पष्टता नहीं है।
सरकारी निर्माण कार्य में सूचना पट्ट का उद्देश्य सिर्फ यह बताना नहीं होना चाहिए कि काम किसके कार्यकाल या प्रयास से हुआ। जनता का अधिकार यह जानना भी है कि काम किस योजना से हुआ, कितने बजट में हुआ, किस संस्था ने कराया और उसकी निगरानी किस स्तर पर हुई।
ऐसे में सवाल उठता है—अगर जनता के पैसे से निर्माण हुआ है तो जनता को खर्च की जानकारी आसानी से क्यों नहीं मिलनी चाहिए?
55 लाख या 90 लाख? असली आंकड़ा कौन बताएगा?
लागत को लेकर अलग-अलग चर्चाओं ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। कोई निर्माण की कीमत करीब 55 लाख रुपये बता रहा है तो कोई इससे अधिक रकम की चर्चा कर रहा है। लेकिन जब तक नगर पालिका के अधिकृत अभिलेख सामने नहीं आते, तब तक किसी भी आंकड़े को वास्तविक मानना उचित नहीं होगा।
यही कारण है कि अब नगर पालिका प्रशासन को सामने आकर स्पष्ट करना चाहिए कि इस परियोजना की प्रशासनिक स्वीकृति कितने रुपये की थी, तकनीकी स्वीकृति कितने की थी और अब तक कितना भुगतान किया गया है।
यदि वास्तविक लागत सामने आ जाती है तो चर्चाओं और कयासों पर तत्काल विराम लग सकता है।
बजट पूछा गया तो जवाब ने बढ़ा दिए सवाल
पड़ताल के दौरान नगर पालिका के बाबू राजेश श्रीवास्तव से निर्माण बजट के संबंध में जानकारी मांगी गई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने बजट की जानकारी होने से इनकार किया और इसे बताने में भी असमर्थता जताई।
यहीं से मामला और गंभीर हो जाता है।एक तरफ निर्माण स्थल पर लागत का स्पष्ट आंकड़ा दिखाई नहीं देता और दूसरी तरफ नगर पालिका कार्यालय से भी तत्काल बजट संबंधी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाती। ऐसे में आम नागरिक आखिर यह जानकारी कहां से प्राप्त करे?
सवाल सीधा है—सरकारी धन खर्च करने वाली संस्था में उसी धन के खर्च का आंकड़ा जानना इतना मुश्किल क्यों है?
निर्माण की गुणवत्ता पर भी उठी उंगली
मामला केवल बजट तक सीमित नहीं है। स्थानीय स्तर पर निर्माण की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि जमीन पर दिखाई दे रहे कार्य और संभावित खर्च के बीच अंतर नजर आता है।
हालांकि गुणवत्ता संबंधी किसी भी आरोप की पुष्टि केवल तकनीकी जांच के बाद ही हो सकती है। इसलिए इस मामले में सबसे उचित रास्ता यही होगा कि सक्षम तकनीकी अधिकारियों की टीम मौके पर पहुंचकर निर्माण की जांच करे। इंटरलॉकिंग की मोटाई, नीचे की बेस लेयर, इस्तेमाल की गई सामग्री, निर्माण की लंबाई-चौड़ाई और स्वीकृत एस्टीमेट के अनुरूप कार्य हुआ या नहीं—इन सभी बिंदुओं की जांच की जाए। जरूरत पड़ने पर माप पुस्तिका यानी एमबी में दर्ज विवरण और जमीन पर हुए वास्तविक काम का मिलान भी कराया जाए।
ईओ के तर्क से भी खड़े हुए नए सवाल
निर्माण स्थल पर धनराशि और क्षेत्रफल जैसे विवरण दर्ज नहीं होने के संबंध में अधिशासी अधिकारी से संपर्क का प्रयास किया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पूर्व में उनका तर्क रहा कि शिलापट अथवा निर्माण स्थल का बोर्ड मुख्य रूप से शिलान्यास और लोकार्पण से संबंधित होता है तथा हर स्थिति में उस पर धनराशि या क्षेत्रफल लिखना अनिवार्य नहीं होता।यदि ऐसा है, तब भी मूल सवाल अपनी जगह कायम है—जनता को परियोजना की वास्तविक लागत की जानकारी कहां से मिलेगी?अगर सूचना पट्ट पर नहीं, तो नगर पालिका कार्यालय में संबंधित स्वीकृति, कार्यादेश, अनुबंध और भुगतान संबंधी दस्तावेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने चाहिए। पारदर्शिता का अर्थ सिर्फ बोर्ड लगा देना नहीं, बल्कि जनता के सवालों का प्रमाणित जवाब उपलब्ध कराना भी है।
अब फाइलों से बाहर आना चाहिए छठ घाट का हिसाब
इस पूरे मामले में विवाद खत्म करने का सबसे आसान तरीका भी सामने है। नगर पालिका प्रशासन परियोजना से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करे—प्रशासनिक स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति, स्वीकृत एस्टीमेट, कार्यादेश, टेंडर या अनुबंध, माप पुस्तिका और भुगतान से संबंधित अभिलेख।इसके साथ ही स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए। जांच में यदि निर्माण पूरी तरह मानक के अनुरूप मिलता है तो उठ रहे सवालों का जवाब खुद मिल जाएगा। लेकिन यदि एस्टीमेट और मौके के काम में अंतर मिलता है, तो जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।फिलहाल तस्वीर यही है कि बोर्ड पर नाम हैं, लेकिन लागत का स्पष्ट आंकड़ा नहीं; निर्माण दिखाई दे रहा है, लेकिन खर्च का आधिकारिक हिसाब जनता के सामने साफ नहीं है।
अब सवाल सिर्फ शिवाजीनगर छठ घाट का नहीं है। सवाल यह भी है कि नगर पालिका में सार्वजनिक धन से होने वाले निर्माण कार्यों में पारदर्शिता का पैमाना क्या है? क्या जनता को अपने पैसे से हुए काम की लागत और गुणवत्ता जानने का अधिकार सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगा?
विलेज फास्ट टाइम्स का सीधा सवाल है—छठ घाट पर कितना पैसा स्वीकृत हुआ, कितना खर्च हुआ और काम कितना हुआ?
अब जरूरत कयासों की नहीं, दस्तावेजी जवाब और निष्पक्ष तकनीकी जांच की है। जिम्मेदार अधिकारी यदि वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक कर दें तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
