
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर
कुशीनगर।
जनपद कुशीनगर की तहसील तमकुहीराज में फर्जी हस्ताक्षर का ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। पूर्व तहसीलदार सुनील कुमार सिंह, जो वर्तमान में कलेक्ट्रेट कुशीनगर में तैनात हैं, ने न्याय सहायक (पेशकार) जितेंद्र कुमार यादव पर आरोप लगाए हैं कि उन्होंने नामंत्रण वाद पत्रावलियों में तहसीलदार के फर्जी हस्ताक्षर कर प्रशासनिक प्रक्रिया के साथ सीधा खिलवाड़ किया है।
सिंह का कहना है कि पेशकार ने न सिर्फ जाली हस्ताक्षर किए, बल्कि कई आदेश बिना हस्ताक्षर के ही RCCMS पोर्टल पर अपलोड करके प्रशासनिक रिकॉर्ड व न्यायिक प्रक्रिया को गुमराह करने का प्रयास किया। यह आरोप मामूली नहीं—यह न्याय और दस्तावेज सुरक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सीधी चोट है।
DM की कड़क प्रतिक्रिया — “दोषी बचेंगे नहीं!”
शिकायत मिलते ही जिलाधिकारी कुशीनगर ने मामले की जांच कराई। प्रारंभिक साक्ष्यों के बाद DM ने आदेश जारी किया कि आरोप सिद्ध होने की स्थिति में अपराध गंभीर है, इसलिए FIR दर्ज की जाए।
DM के शब्द प्रशासनिक गलियारों में गूंज रहे हैं—
“जहां न्यायिक व्यवस्था पर चोट होती है, वहां उदारता की कोई जगह नहीं। फर्जी हस्ताक्षर और रिकॉर्ड में छेड़छाड़ प्रशासनिक अनुशासन का खुला उल्लंघन है—कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।”
कानून क्या कहता है?
विशेषज्ञों के अनुसार फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेज फर्जीवाड़ा भारतीय दंड संहिता की धारा 465 (जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी हेतु जालसाजी) और 471 (जाली दस्तावेज का उपयोग) के तहत गंभीर अपराधिक अपराध हैं, जिनमें 7 वर्ष तक की कठोर सज़ा व जुर्माने का प्रावधान है।
यानी “हस्ताक्षर सिर्फ कलम नहीं, कानून की मुहर हैं—उन्हें बदलना अपराध ही नहीं, भरोसे की हत्या है।”
प्रशासनिक जिम्मेदारी तय होगी?
सूत्रों के अनुसार यह मामला सिर्फ पेशकार तक सीमित नहीं रहेगा। सवाल उठ रहे हैं—
दस्तावेज़ सुरक्षा की निगरानी किसके जिम्मे?
RCCMS अपलोडिंग की क्रॉस-चेकिंग क्यों नहीं?
किस स्तर पर लापरवाही हुई?
कर्मचारी संगठनों में भी चर्चा तेज है कि यह घटना आंतरिक सिस्टम की कमजोरी उजागर करती है, और अब निगरानी व अनुमोदन प्रक्रिया में सुधार तय माना जा रहा है।
निचोड़ — “इस बार जांच नहीं, कार्रवाई की बारी!”
कुशीनगर में यह मामला सिर्फ एक कर्मचारी पर आरोप नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की जवाबदेही का टेस्ट बन चुका है।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या यह सिर्फ आरोपों की फाइल बनेगी या फर्जी हस्ताक्षर का यह कांड—उदाहरणात्मक कार्रवाई का अध्याय बनेगा?
