



करोड़ों की राजस्व चोरी में कौन-कौन शामिल? किसकी शह पर दौड़ रहीं बिना आईएसटीपी वाली ट्रकें?
“सीमा पर सख्ती” या “सिस्टम की सांठगांठ”?
बड़े चेहरों तक पहुंचेगी जांच या फिर छोटे मोहरे ही होंगे कुर्बान?
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर।
कुशीनगर की सीमा इन दिनों सिर्फ उत्तर प्रदेश और बिहार को नहीं जोड़ रही, बल्कि वह कथित तौर पर “राजस्व चोरी, सेटिंगबाजी और संरक्षण के काले गठजोड़” का सबसे बड़ा कॉरिडोर बनती दिखाई दे रही है। बिहार सीमा से रात के अंधेरे में निकलती बालू और मोरंग से लदी ट्रकों ने प्रशासनिक दावों की ऐसी धज्जियां उड़ाई हैं कि अब सवाल सिर्फ अवैध खनन का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर उठने लगा है।
सीमा पर चौबीसों घंटे चेकिंग का दावा किया जा रहा है। अधिकारियों के बयान आ रहे हैं। कार्रवाई की तस्वीरें वायरल हो रही हैं। लेकिन दूसरी तरफ इलाके में चर्चा यह है कि “मैनेज ट्रकें” आज भी उसी रफ्तार से दौड़ रही हैं जैसे कानून और शासन उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखता। जनता पूछ रही है—अगर चेकिंग इतनी कड़ी है, तो आखिर बिना आईएसटीपी वाली ट्रकें कई-कई थाना क्षेत्रों की सीमाएं पार कैसे कर रही हैं? क्या इन ट्रकों के पास कोई अदृश्य पास है? या फिर सिस्टम के भीतर बैठा कोई “सफेदपोश नेटवर्क” इन्हें सुरक्षा कवच प्रदान कर रहा है?

सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, हर रात बिहार सीमा से सैकड़ों ट्रकें निकलती हैं। कुछ ट्रकों के कागज पूरे होते हैं, लेकिन कई ऐसी भी बताई जा रही हैं जो बिना वैध आईएसटीपी के ही यूपी की सीमा में प्रवेश कर जाती हैं। यही वजह है कि करोड़ों रुपये के राजस्व नुकसान की चर्चा अब खुलेआम होने लगी है। लोगों का कहना है कि यह सिर्फ ट्रकों का खेल नहीं, बल्कि “इंट्री माफिया” और कथित संरक्षण तंत्र का सुव्यवस्थित कारोबार है, जिसमें नीचे से ऊपर तक कई कड़ियां जुड़ी हो सकती हैं।
पिछले एक पखवाड़े से जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर और पुलिस अधीक्षक केशव कुमार द्वारा राजस्व चोरी के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है। बहादुरपुर चौकी पर सघन जांच का दावा किया जा रहा है। लेकिन सवाल वही—जब सीमा पर इतनी सख्ती है तो ट्रकें तमकुहीराज, सेवरही और पटहेरवा तक कैसे पहुंच जा रही हैं? आखिर किसके इशारे पर ये ट्रकें पुलिस चौकियों और थाना क्षेत्रों को पार करती चली जाती हैं?

14 मई को सीओ तमकुही के नेतृत्व में हुई कार्रवाई में बिना आईएसटीपी वाली 10 ट्रकों को पकड़ा गया। करीब पांच लाख रुपये का चालान हुआ और सात लोगों पर मुकदमा दर्ज हुआ। प्रशासन ने इसे बड़ी सफलता बताया, लेकिन इस कार्रवाई ने सिस्टम की पोल भी खोल दी। इलाके में लोग कटाक्ष करते हुए कह रहे हैं—“अगर दस ट्रकें पकड़ी गईं, तो बाकी कितनी निकल गई होंगी?” सवाल यह भी है कि जब ट्रकें सीमा पार कर कई किलोमीटर अंदर तक पहुंच गई थीं, तब तक जिम्मेदार विभाग और चौकियां क्या कर रही थीं?
यही वह बिंदु है जहां पूरा मामला केवल अवैध खनन से आगे बढ़कर कथित प्रशासनिक मिलीभगत की तरफ इशारा करने लगता है। स्थानीय चर्चाओं में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या कुछ ट्रकों को जानबूझकर “ग्रीन सिग्नल” दिया जाता है? क्या “लाइन क्लियर” होने के बाद ही गाड़ियां आगे बढ़ती हैं? और क्या रास्ते में मौजूद कुछ लोग सिर्फ “चयनित कार्रवाई” के लिए ही सक्रिय रहते हैं?

सबसे ज्यादा हलचल उस एफआईआर ने मचाई जिसमें 13 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। आरोप है कि ये लोग बिना आईएसटीपी के ट्रकों को अवैध तरीके से पास कराते थे। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों के नाम एफआईआर में आए, वही लोग कथित तौर पर विभाग में मजबूत पकड़ रखने वाले बताए जा रहे हैं। सूत्रों की मानें तो आरोपियों में एक ऐसा शख्स भी शामिल है जिसे खनन विभाग का “कारखास” कहा जाता है। इलाके में चर्चा है कि यह व्यक्ति विभागीय गतिविधियों, अधिकारियों की कार्यशैली और “अंदरूनी सिस्टम” की गहरी जानकारी रखता है।
यहीं से लोगों के मन में शक और गहराता जा रहा है। लोग पूछ रहे हैं—क्या यह एफआईआर वास्तव में कार्रवाई है या फिर “बड़े खिलाड़ियों” को बचाने के लिए रची गई एक रणनीति? क्या छोटे मोहरों को आगे कर असली चेहरे बचाए जा रहे हैं? क्योंकि इलाके में यह चर्चा भी है कि जिन लोगों पर मुकदमा दर्ज हुआ, वे आज भी विभागीय कार्यालयों और थानों में उसी बेखौफ अंदाज में आते-जाते देखे जा रहे हैं जैसे उन्हें किसी बड़े संरक्षण का भरोसा हो।
खनन विभाग के चालक जितेंद्र और मुंशी सतीश का नाम भी चर्चाओं में है। स्थानीय जानकारों का दावा है कि यदि इन लोगों के मोबाइल नंबरों की कॉल डिटेल, लोकेशन हिस्ट्री और चैट रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो पूरे “इंट्री नेटवर्क” का चेहरा सामने आ सकता है। कहा जा रहा है कि कौन सी ट्रक कब निकलेगी, कौन से रास्ते से जाएगी, किस चौकी पर किससे संपर्क होगा, कौन सी गाड़ी पकड़ी जाएगी और कौन सी आराम से निकल जाएगी—सब कुछ पहले से तय रहता है।

इलाके में लोग कटाक्ष करते हुए कहते हैं—“यह खेल सड़क पर कम, मोबाइल फोन पर ज्यादा चलता है।” यानी असली ट्रैफिक कंट्रोल सड़क पर नहीं, बल्कि फोन कॉल और कथित सेटिंग के जरिए होता है। यही वजह है कि ट्रकों की आवाजाही को लेकर अब सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन और वित्तीय लेनदेन की जांच की मांग उठने लगी है।
विडंबना यह भी है कि कार्रवाई का शिकंजा अक्सर उन्हीं ट्रांसपोर्टरों पर कसता दिखाई देता है जिनकी “ऊपर तक पहुंच” नहीं होती। जिनके पास विभागीय या राजनीतिक संरक्षण मजबूत बताया जाता है, उनकी गाड़ियां कथित तौर पर बिना डर के दौड़ती रहती हैं। यही कारण है कि इलाके में यह धारणा बनती जा रही है कि कानून का डंडा कमजोरों पर चलता है, जबकि असली खिलाड़ी पर्दे के पीछे सुरक्षित बैठे रहते हैं।
इस पूरे मामले में पुलिस अधीक्षक केशव कुमार द्वारा तरया सुजान थानाध्यक्ष राम सहाय चौहान और बहादुरपुर चौकी प्रभारी विक्रम अजित राय को निलंबित करने की कार्रवाई ने अचानक माहौल गर्म कर दिया। देर रात हुई इस कार्रवाई ने पूरे पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया। माना जा रहा है कि लगातार मिल रही शिकायतों और कथित सेटिंगबाजी के आरोपों के बाद यह कदम उठाया गया। लेकिन अब लोगों की निगाह इस बात पर है कि क्या कार्रवाई सिर्फ निलंबन तक सीमित रहेगी या फिर जांच की आंच बड़े चेहरों तक भी पहुंचेगी?
जनता के बीच यह सवाल भी गूंज रहा है कि आखिर वर्षों से चल रहे इस कथित खेल की भनक किसी को नहीं थी क्या? क्या करोड़ों रुपये की राजस्व चोरी बिना किसी संरक्षण के संभव है? क्या रात में सैकड़ों ट्रकों की आवाजाही प्रशासनिक सिस्टम की नजरों से ओझल रह सकती है? या फिर सब कुछ जानते हुए भी “मौन सहमति” का खेल चलता रहा?
कुशीनगर में बालू और मोरंग का यह खेल अब प्रशासनिक विश्वसनीयता की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है। लोग चाहते हैं कि जांच केवल छोटे कर्मचारियों या सीमित स्तर तक न रुके, बल्कि उस पूरी चेन तक पहुंचे जो सीमा से लेकर चौकियों, थानों, विभागीय संपर्कों और कथित इंट्री नेटवर्क तक फैली बताई जा रही है।
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि निष्पक्ष एजेंसी द्वारा मोबाइल कॉल डिटेल, बैंक लेनदेन, लोकेशन हिस्ट्री और सीसीटीवी फुटेज की जांच हो जाए, तो कई ऐसे चेहरे सामने आ सकते हैं जिनकी कल्पना भी आम जनता नहीं कर रही। क्योंकि यह खेल किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि कथित तौर पर एक संगठित नेटवर्क का प्रतीक बन चुका है।
फिलहाल कुशीनगर की सड़कों पर दौड़ती बालू ट्रकें सिर्फ वाहन नहीं रहीं, बल्कि वे उस सिस्टम की कहानी कह रही हैं जहां एक तरफ शासन “जीरो टॉलरेंस” का दावा करता है और दूसरी तरफ जनता पूछती है—“अगर सब कुछ पारदर्शी है, तो फिर रात के अंधेरे में यह खेल आखिर किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है?”
अब देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन इस मामले में सिर्फ छोटे खिलाड़ियों को पकड़कर अपनी पीठ थपथपाएगा या फिर उन बड़े चेहरों तक भी पहुंचेगा जिनके बारे में इलाके में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। क्योंकि जनता की अदालत में अब एक ही सवाल गूंज रहा है—“क्या इस बार सच सामने आएगा, या फिर बालू का यह काला साम्राज्य पहले की तरह सबूतों और सेटिंग के धुएं में गायब हो जाएगा?”
