

16 मई | विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता अमित कुमार कुशवाहा
तमकुहीराज तहसील सभागार में शनिवार को आयोजित सम्पूर्ण समाधान दिवस एक बार फिर जनता की उम्मीदों, शिकायतों और प्रशासनिक दावों का बड़ा मंच बनकर सामने आया। जिलाधिकारी महेन्द्र सिंह तंवर और पुलिस अधीक्षक केशव कुमार की मौजूदगी में फरियादियों की लंबी कतारें यह बताने के लिए काफी थीं कि गांवों से लेकर तहसील तक समस्याओं का अंबार अभी भी जस का तस खड़ा है।
समाधान दिवस में अधिकारियों ने भले ही “त्वरित एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण” का दावा किया, लेकिन जनता के चेहरों पर दिख रही बेचैनी कई सवाल खड़े करती नजर आई। राजस्व विवाद, पुलिस की ढीली कार्यशैली, विकास कार्यों में लापरवाही, विद्युत समस्याएं, सामाजिक योजनाओं में पात्रों की अनदेखी और भूमि विवाद जैसे मुद्दे सबसे ज्यादा हावी रहे। कई फरियादी ऐसे भी दिखे जो पहले भी कई बार तहसील और थाने का चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन उनकी फाइलें अब तक “जांच जारी है” की सरकारी दीवार से बाहर नहीं निकल पाई हैं।
जिलाधिकारी महेन्द्र सिंह तंवर ने अधिकारियों को साफ शब्दों में चेतावनी दी कि शिकायतों के निस्तारण में लापरवाही और अनावश्यक देरी किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने राजस्व, पुलिस, वन, विकास और अन्य विभागों के अधिकारियों को मौके पर जाकर निष्पक्ष जांच करने और गुणवत्तापूर्ण समाधान देने के निर्देश दिए। हालांकि जनता के बीच यह चर्चा भी गर्म रही कि अगर निस्तारण पहले से सही और समय पर होता, तो हर महीने लगने वाले समाधान दिवस में इतनी भारी संख्या में शिकायतें आखिर क्यों पहुंचतीं?
पुलिस अधीक्षक केशव कुमार ने भी कानून व्यवस्था और भूमि विवाद जैसे मामलों को गंभीर बताते हुए पुलिस एवं राजस्व विभाग को बेहतर समन्वय के निर्देश दिए। लेकिन तहसील परिसर में मौजूद कई लोगों की प्रतिक्रिया कुछ अलग ही थी। लोगों का कहना था कि “जमीन विवादों में कार्रवाई से ज्यादा फाइलें घूमती हैं और पीड़ित सिर्फ तारीख पर तारीख लेकर लौटता है।” कुछ फरियादियों ने दबे स्वर में यह भी कहा कि निचले स्तर के कर्मचारी और विभागीय तंत्र यदि सक्रिय रहें, तो जनता को जिलाधिकारी और एसपी तक गुहार लगाने की नौबत ही न आए।
सम्पूर्ण समाधान दिवस में कुल 58 शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें सबसे अधिक 25 मामले राजस्व विभाग से जुड़े रहे। पुलिस विभाग से 14, विकास विभाग से 5 तथा अन्य विभागों से 14 शिकायतें प्राप्त हुईं। इनमें से केवल 6 मामलों का मौके पर निस्तारण हो सका। यही आंकड़ा प्रशासनिक व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल भी खड़ा करता दिखा—जब मौके पर केवल छह समस्याएं हल हो पाईं, तो बाकी फरियादियों को फिर कितने चक्कर लगाने पड़ेंगे?
हालांकि मंच से अधिकारियों ने पारदर्शिता, संवेदनशीलता और जवाबदेही की बड़ी-बड़ी बातें कहीं, लेकिन अब जनता की निगाहें आश्वासनों पर नहीं बल्कि धरातल पर दिखने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं। क्योंकि ग्रामीणों का साफ कहना है—“फरियाद सुन लेना आसान है, लेकिन न्याय दिलाना ही असली प्रशासन है।”
