
मुख्यमंत्री जी! हजम नहीं हो रहा है बुद्धा पार्क में पांच करोड़ का निर्माण, मौके पर न बोर्ड, न दस्तावेज
बुद्धा पार्क में पांच करोड़ का निर्माण सवालों के घेरे में
ग्राउंड जीरो पर दिखीं गंभीर कमियां, पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल
विलेज फास्ट टाइम्स | कुशीनगर | विशेष संवाददाता
कुशीनगर जिले के प्रशासनिक हृदय कहे जाने वाले कलेक्ट्रेट परिसर के सामने स्थित बुद्धा पार्क में करीब पांच करोड़ रुपये की लागत से कराए जा रहे निर्माण कार्य को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कागजों में भले ही यह परियोजना जिले के सौंदर्यीकरण और जनसुविधा बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण बताई जा रही हो, लेकिन ग्राउंड जीरो की तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां करती दिखाई दे रही है।
स्थानीय स्तर पर सामने आ रही जानकारियों और मौके पर दिख रही स्थितियों ने यह चर्चा तेज कर दी है कि आखिर इतनी बड़ी लागत के निर्माण कार्य में पारदर्शिता और तकनीकी निगरानी की वास्तविक स्थिति क्या है।
बताया जा रहा है कि बुद्धा पार्क के सुंदरीकरण के तहत यहां व्यायामशाला, कार्यालय कक्ष, गोदाम, शौचालय, पाथ-वे और अन्य संरचनात्मक निर्माण कराए जा रहे हैं। लेकिन मौके पर देखने पर कई स्थानों पर निर्माण की गुणवत्ता, फिनिशिंग और मजबूती को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। खासकर पाथ-वे निर्माण में समतलता, मजबूती और निर्धारित चार इंच मोटाई के मानकों को लेकर स्थानीय स्तर के जानकारों के बीच चर्चा तेज है।
हालांकि संबंधित विभाग के अवर अभियंता वेदांत भट्ट अपने लिखित स्पष्टीकरण में निर्माण कार्य को पूरी तरह मानकों के अनुरूप बता चुके हैं, लेकिन मौके पर दिख रही स्थिति को लेकर संदेह पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया है। यही वजह है कि यह मामला अब प्रशासनिक गलियारों से निकलकर आम जनचर्चा का विषय बनता जा रहा है।

सूचना पट्ट तक नहीं, परियोजना की जानकारी गायब
सरकारी निर्माण कार्यों में कार्यस्थल पर सूचना पट्ट लगाना अनिवार्य माना जाता है, जिसमें कार्यदायी संस्था, परियोजना की लागत, कार्य अवधि, संबंधित अभियंताओं और ठेकेदार की जानकारी स्पष्ट रूप से अंकित रहती है। लेकिन बुद्धा पार्क में चल रहे इस करोड़ों रुपये के निर्माण कार्य के दौरान मौके पर कोई स्पष्ट सूचना पट्ट दिखाई नहीं देता।
इस स्थिति ने परियोजना की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब परियोजना की मूलभूत जानकारी ही सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, तो फिर आम जनता यह कैसे जाने कि कौन संस्था काम कर रही है, कितनी लागत है और निर्माण कब तक पूरा होना है।
ठेकेदार के सुपरवाइजर के भरोसे चल रहा काम
मौके पर जुटाई गई जानकारी के अनुसार पूरे निर्माण कार्य की निगरानी मुख्य रूप से ठेकेदार के सुपरवाइजर के भरोसे ही चलती दिखाई दे रही है। विभागीय अभियंताओं या जिम्मेदार अधिकारियों की नियमित मौजूदगी कम ही नजर आती है।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि पांच करोड़ रुपये जैसी भारी भरकम लागत वाली परियोजना की तकनीकी गुणवत्ता की निगरानी आखिर किस स्तर पर की जा रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि विभागीय स्तर पर नियमित तकनीकी निरीक्षण नहीं हो रहा है तो निर्माण की गुणवत्ता को लेकर संदेह और गहराना स्वाभाविक है।
निर्माण स्थल पर सुरक्षा व्यवस्था भी गायब
निर्माण स्थल पर श्रमिकों की सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्थाओं का भी अभाव दिखाई देता है। कई जगहों पर सुरक्षा घेरा, चेतावनी संकेत या कार्यस्थल को सुरक्षित रखने की कोई ठोस व्यवस्था नजर नहीं आती।
ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या निर्माण कार्य के दौरान श्रमिकों की सुरक्षा मानकों का पालन किया जा रहा है या नहीं।
मौके पर जरूरी रजिस्टर और दस्तावेज भी नहीं मिले
ग्राउंड जीरो पर सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि निर्माण स्थल पर वे अनिवार्य दस्तावेज और रजिस्टर भी उपलब्ध नहीं मिले, जो किसी भी सरकारी निर्माण कार्य के लिए जरूरी माने जाते हैं।
इनमें प्रमुख रूप से डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट), स्वीकृत नक्शा, साइट माप रजिस्टर, एमबी (मेजरमेंट बुक), क्वालिटी कंट्रोल रजिस्टर, सामग्री परीक्षण रिपोर्ट, सामग्री खरीद रजिस्टर, साइट ऑर्डर बुक, विजिट रजिस्टर, ठेकेदार व सुपरवाइजर विवरण रजिस्टर, कार्य कार्यक्रम रजिस्टर तथा सुरक्षा अनुपालन रजिस्टर शामिल हैं।
जानकारों के अनुसार इन दस्तावेजों की उपलब्धता से ही यह सुनिश्चित होता है कि निर्माण कार्य निर्धारित मानकों और प्रक्रिया के अनुरूप हो रहा है। इनके अभाव में यह सवाल और भी गहरा हो जाता है कि कार्य की तकनीकी जांच और गुणवत्ता नियंत्रण आखिर किस आधार पर किया जा रहा है।
नोटिस और स्पष्टीकरण के बाद भी नहीं थमे सवाल
गौरतलब है कि यह मामला तब सुर्खियों में आया था जब विलेज फास्ट टाइम्स व युगान्धर टाइम्स सहित लखनऊ से प्रकाशित कई समाचार पत्रों ने इस निर्माण कार्य में संभावित अनियमितताओं को प्रमुखता से उठाया था।
मामले के तूल पकड़ने के बाद जिलाधिकारी ने संबंधित कार्यदायी संस्था यूपीआरएनएसएस के अधिशासी अभियंता को नोटिस जारी किया था। इसके जवाब में अधिशासी अभियंता ने अपने स्पष्टीकरण में निर्माण कार्य को पूरी तरह मानकों के अनुरूप बताते हुए सभी आरोपों को खारिज कर दिया था।
लेकिन अब जब ग्राउंड जीरो पर कई सवाल फिर सामने आ रहे हैं, तो चर्चा तेज हो गई है कि आखिर इतनी बड़ी लागत वाली परियोजना की स्वतंत्र तकनीकी जांच क्यों नहीं कराई जा रही।
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि दिल्ली स्थित मानवाधिकार एवं भ्रष्टाचार अन्वेषण परिषद इस पूरे प्रकरण को लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्री से मुलाकात कर स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराने की मांग करने की तैयारी कर रही है।
फिलहाल बुद्धा पार्क में चल रहा यह पांच करोड़ रुपये का निर्माण कार्य जिले में चर्चा और संदेह दोनों का केंद्र बन गया है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले को केवल कागजी स्पष्टीकरण तक सीमित रखता है या फिर वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए किसी उच्चस्तरीय तकनीकी जांच का रास्ता अपनाता है।
