
कुशीनगर, 31 मार्च | विलेज फास्ट टाइम्स
बच्चों की सुरक्षा को लेकर अक्सर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कई बार इन दावों की पोल खोल देती है। जर्जर बसें, बिना फिटनेस के दौड़ते वाहन, लापरवाह चालक—ये सब अब बीते दिनों की बात बनने जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश शासन ने आखिरकार सख्ती दिखाते हुए स्कूली वाहनों की सुरक्षा को लेकर बड़ा कदम उठाया है।
अपर मुख्य सचिव के निर्देश पर 01 अप्रैल 2026 से 15 अप्रैल 2026 तक पूरे प्रदेश में स्कूली वाहनों की फिटनेस और सुरक्षा मानकों की जांच के लिए विशेष अभियान चलाया जाएगा। इसके साथ ही एक ऑनलाइन पोर्टल/एप भी लॉन्च किया गया है, जो अब “कागजों में सब ठीक है” वाली पुरानी मानसिकता पर सीधा प्रहार करेगा।
🔍 अब हर जानकारी ऑनलाइन—बहानों की छुट्टी
सहायक सम्भागीय परिवहन अधिकारी ने साफ कर दिया है कि अब कोई भी विद्यालय जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। 01 अप्रैल से पोर्टल लाइव होते ही सभी स्कूलों को अपने वाहनों का पूरा ब्योरा अपलोड करना अनिवार्य होगा।
जैसे ही वाहन संख्या डाली जाएगी, VAHAN-4.0 से फिटनेस, बीमा, प्रदूषण प्रमाणपत्र और परमिट की वैधता खुद सामने आ जाएगी। यानी अब “साहब, कागज घर पर रह गया” जैसे बहाने नहीं चलेंगे।
इसी तरह चालक का लाइसेंस नंबर डालते ही सारथी पोर्टल से उसका पूरा रिकॉर्ड सामने आ जाएगा। इतना ही नहीं, चालकों का चरित्र सत्यापन भी संबंधित थाने से कराकर अपलोड करना अनिवार्य कर दिया गया है।
सुरक्षा के नाम पर दिखावा अब नहीं
अब स्कूल बसों में केवल “स्कूल बस” लिख देना काफी नहीं होगा। पोर्टल पर यह भी बताना होगा कि वाहन में—
अग्निशमन यंत्र है या नहीं
फर्स्ट-एड बॉक्स मौजूद है या नहीं
सीसीटीवी कैमरा लगा है या नहीं
स्पीड गवर्नर काम कर रहा है या नहीं
आपातकालीन खिड़की उपलब्ध है या नहीं
सवाल यह है कि क्या अब तक ये व्यवस्थाएं केवल कागजों में ही थीं? अगर थीं, तो अब सच्चाई सामने आएगी।
हर वाहन दायरे में—कोई बच नहीं पाएगा
यह नियम सिर्फ स्कूल की बसों तक सीमित नहीं है। इसमें शामिल होंगे—
विद्यालय के नाम से पंजीकृत वाहन
अनुबंधित (कॉन्ट्रैक्ट) वाहन
अभिभावकों द्वारा संचालित वाहन
यानी अब “ये हमारी बस नहीं है” कहकर जिम्मेदारी से बचना आसान नहीं होगा।
“Know Your Bus”—अब अभिभावक भी बनेंगे निगरानीकर्ता
अभिभावकों के लिए पोर्टल पर “Know Your Bus” सुविधा दी गई है। इसके जरिए वे खुद जांच सकेंगे कि उनके बच्चे जिस वाहन से आ-जा रहे हैं, वह सुरक्षित है या नहीं।
साथ ही, चालक या परिचालक के खराब व्यवहार की शिकायत भी अब सीधे ऑनलाइन दर्ज की जा सकेगी। यानी अब शिकायतें फाइलों में दबेंगी नहीं, सीधे सिस्टम में दर्ज होंगी।
रेड फ्लैग सिस्टम—गड़बड़ी हुई तो तुरंत अलर्ट
अगर किसी वाहन में कोई कमी पाई जाती है, तो पोर्टल पर रेड फ्लैग दिखेगा। यह न सिर्फ स्कूल के लिए चेतावनी होगी, बल्कि अधिकारियों की नजर में भी मामला तुरंत आ जाएगा।
मॉनिटरिंग का जिम्मा भी हल्का-फुल्का नहीं रखा गया है। प्रमुख सचिव से लेकर जिलाधिकारी, परिवहन अधिकारी, जिला विद्यालय निरीक्षक और बेसिक शिक्षा अधिकारी तक—सबकी सीधी नजर इस पोर्टल पर रहेगी।
ग्रीष्मकाल में विशेष शिविर—सिर्फ कागज नहीं, जमीनी जांच
परिवहन विभाग ने यह भी साफ कर दिया है कि केवल ऑनलाइन डेटा से काम नहीं चलेगा। ग्रीष्मकालीन अवकाश में तहसील स्तर पर विशेष शिविर लगाकर—
वाहनों का भौतिक निरीक्षण
तकनीकी जांच
चालक और परिचालकों का स्वास्थ्य एवं नेत्र परीक्षण
भी कराया जाएगा।
अपील या चेतावनी?
सहायक सम्भागीय परिवहन अधिकारी ने विद्यालय प्रबंधनों से “अपील” की है कि वे 01 से 15 अप्रैल के बीच सभी सूचनाएं समय से अपलोड करें। लेकिन हालात को देखते हुए यह अपील कम और एक सख्त चेतावनी ज्यादा लगती है।
बड़ा सवाल
हर साल हादसों के बाद ही क्यों जागता है सिस्टम? क्यों बच्चों की जान जोखिम में डालकर स्कूल और वाहन संचालक नियमों की अनदेखी करते रहे?
अब जब सरकार ने डिजिटल निगरानी और सख्त कार्रवाई का रास्ता चुना है, तो यह देखना होगा कि यह अभियान केवल 15 दिनों की औपचारिकता बनकर रह जाता है या वास्तव में बच्चों की सुरक्षा का मजबूत कवच साबित होता है।
फिलहाल साफ है—अब स्कूली वाहनों में लापरवाही करने वालों के लिए रास्ता आसान नहीं, बल्कि बेहद मुश्किल होने वाला है।
