
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर।
जनपद में “वृक्षारोपण महाभियान-2025” अब पर्यावरण संरक्षण से ज्यादा सरकारी आंकड़ों, कागजी हरियाली और प्रशासनिक जवाबदेही पर उठते गंभीर सवालों का प्रतीक बनता जा रहा है। करोड़ों रुपये खर्च कर जिस अभियान को ऐतिहासिक सफलता बताकर शासन-प्रशासन ने वाहवाही लूटने की कोशिश की, अब उसी अभियान की जड़ें खुद सरकारी बैठकों में हिलती दिखाई दे रही हैं। सरकारी फाइलों में उगाए गए “हरे-भरे जंगल” की जमीनी तस्वीर देखकर लोग पूछ रहे हैं — आखिर पौधे जमीन पर लगे थे या सिर्फ पोर्टल और प्रेस नोट में?
हाल ही में आयोजित समीक्षा बैठक में दावा किया गया कि 9 जुलाई 2025 को जनपद में एक ही दिन में 39 लाख 72 हजार 500 पौधों का रोपण किया गया। इनमें अकेले वन विभाग द्वारा 10 लाख 49 हजार 600 पौधे लगाए जाने की बात कही गई, जबकि अन्य 23 विभागों ने मिलकर 29 लाख 22 हजार 900 पौधे लगाने का दावा किया। सुनने में यह उपलब्धि किसी राष्ट्रीय रिकॉर्ड जैसी लगती है, लेकिन जैसे ही जमीनी हकीकत की परतें खुलनी शुरू हुईं, वैसे ही इन आंकड़ों की विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में आ गई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस अभियान को “ऐतिहासिक हरियाली मिशन” कहा गया, उसकी जियो टैगिंग तक पूरी नहीं हो सकी। सरकारी बैठक में खुद यह स्वीकार करना पड़ा कि राजस्व विभाग अब तक पौधों की शत-प्रतिशत जियो टैगिंग नहीं कर पाया है। स्थिति इतनी गंभीर रही कि मुख्य विकास अधिकारी को निर्देश देना पड़ा कि 18 मई 2026 तक हर हाल में जियो टैगिंग पूरी कराई जाए। अब आम लोग पूछ रहे हैं — जब पौधों की सही लोकेशन तक तय नहीं है, तो फिर उनकी जीवितता का दावा किस आधार पर किया जा रहा है? क्या पेड़ हवा में लगाए गए थे? या फिर सरकारी पोर्टल में “ग्रीन सिग्नल” मिलते ही जंगल तैयार मान लिया गया?
पूरा अभियान वन विभाग की अगुवाई में संचालित हुआ था, इसलिए सवाल सीधे विभाग और जिले के डीएफओ की कार्यप्रणाली पर टिक रहे हैं। आखिर इतने बड़े स्तर पर लगाए गए पौधों की निगरानी किसने की? कितने पौधे आज भी जीवित हैं? कितनों की सिंचाई हुई? कितनों की सुरक्षा हुई? और सबसे बड़ा सवाल — कितने पौधे सिर्फ फाइलों में जिंदा हैं?
सूत्र बताते हैं कि जिले के कई इलाकों में पौधारोपण महज औपचारिकता बनकर रह गया। बरसात के मौसम में गड्ढे खोदे गए, पौधे लगाए गए, फोटो खिंचवाई गई, सोशल मीडिया पोस्ट डाली गई और फिर फाइल बंद हो गई। कुछ ही दिनों बाद पौधे सूख गए, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में “हरियाली” लगातार बढ़ती रही। कई स्थानों पर तो आज पौधों का नामोनिशान तक नहीं बचा, लेकिन कागजों में वे अब भी लहलहा रहे हैं।
जनपद में हर साल पौधारोपण को किसी उत्सव की तरह पेश किया जाता है। मंत्री आते हैं, अधिकारी पौधा पकड़कर कैमरे के सामने मुस्कुराते हैं, जनप्रतिनिधि ट्वीट करते हैं, प्रेस नोट जारी होते हैं और “हरित क्रांति” के दावे किए जाते हैं। लेकिन कुछ महीनों बाद उन्हीं स्थानों पर सूखे पौधे, टूटे ट्री गार्ड और उजड़ी जमीन दिखाई देती है। लोगों का आरोप है कि यह पूरा अभियान पर्यावरण संरक्षण से ज्यादा “फोटोशूट संरक्षण योजना” बनकर रह गया है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पौधों की देखरेख के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। पौधों की खरीद, गड्ढों की खुदाई, मजदूरी, सुरक्षा, सिंचाई, जियो टैगिंग और निगरानी तक के लिए बजट जारी होता है, लेकिन जमीन पर उसका असर दिखाई नहीं देता। कई गांवों में ऐसे स्थान मिले जहां पौधे लगाने का दावा तो किया गया, लेकिन मौके पर सिर्फ सूखी मिट्टी दिखाई दी। लोग तंज कसते हुए कहते हैं कि “कुशीनगर में अब पेड़ जमीन पर कम और सरकारी पोर्टल पर ज्यादा उगते हैं।”
जानकारों के अनुसार किसी भी वृक्षारोपण अभियान की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया जियो टैगिंग होती है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि पौधा वास्तव में कहां लगाया गया और उसकी वर्तमान स्थिति क्या है। लेकिन जब खुद सरकारी समीक्षा बैठक में यह सामने आ जाए कि जियो टैगिंग अधूरी है, तो पूरे अभियान की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अब चर्चा इस बात की भी होने लगी है कि कहीं पौधारोपण के नाम पर सिर्फ लक्ष्य पूरा करने और बजट खर्च दिखाने का खेल तो नहीं खेला गया?
सबसे हैरानी की बात यह है कि विभाग छोटे मामलों में बड़ी सख्ती दिखाता है। यदि कोई गरीब ग्रामीण सूखी लकड़ी काट ले तो वन विभाग तुरंत सक्रिय हो जाता है, लेकिन लाखों पौधों के गायब होने, वन भूमि पर कब्जों और पौधारोपण की वास्तविक स्थिति पर विभाग की सक्रियता अचानक “सूरदास” जैसी क्यों हो जाती है? यही सवाल अब आम जनता खुलकर पूछने लगी है।
अगर सचमुच 39 लाख से अधिक पौधे लगाए गए थे, तो आखिर कुशीनगर की धरती आज भी बंजर जैसी क्यों दिखाई दे रही है? सड़कों के किनारे सूखी जमीन, खाली गड्ढे और टूटे ट्री गार्ड आखिर किस हरियाली की कहानी बयान कर रहे हैं? क्या जिले में वास्तव में जंगल उगाए गए थे, या सिर्फ सरकारी रिपोर्टों में हरियाली रंगी गई थी?

अब मांग उठ रही है कि पिछले पांच वर्षों के पौधारोपण अभियानों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराई जाए। जनपद में लगाए गए सभी पौधों का भौतिक सत्यापन कराया जाए। जियो टैगिंग डेटा सार्वजनिक किया जाए। पौधों की जीवितता की थर्ड पार्टी जांच हो और पूरे अभियान में खर्च हुए बजट का ऑडिट कराया जाए। क्योंकि सवाल सिर्फ पौधों का नहीं है, सवाल जनता के पैसे, सरकारी जवाबदेही और पर्यावरण संरक्षण की विश्वसनीयता का है।
फिलहाल कुशीनगर में “वृक्षारोपण महाभियान-2025” हरियाली से ज्यादा सवाल उगा रहा है। और जनता यह जानना चाहती है कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी जमीन सूखी क्यों है? कहीं ऐसा तो नहीं कि इस पूरे अभियान में पेड़ों से ज्यादा सिर्फ कागज हरे किए गए?
