
डीएम की दोटूक— स्थलीय जांच के बिना नहीं होगा फैसला, ‘जनता दर्शन’ से नहीं खुलेगा जाति का ताला
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। वर्षों से जाति प्रमाण पत्र को लेकर तहसीलों में चल रहे “कागजी खेल”, सिफारिशों और विवादों पर अब प्रशासन ने सख्त रुख अपनाने के संकेत दे दिए हैं। गुरुवार को कलेक्ट्रेट सभागार में जिलाधिकारी महेन्द्र सिंह तंवर की अध्यक्षता में आयोजित जनपदीय जाति प्रमाण पत्र सत्यापन समिति की बैठक में साफ संदेश दिया गया कि अब केवल फाइलों की कलाबाजी से जाति प्रमाण पत्र जारी नहीं होंगे, बल्कि गांव-समाज तक पहुंचकर हकीकत की पड़ताल की जाएगी।
बैठक में अपर जिलाधिकारी (वि०/रा०), तहसीलदार हाटा, तमकुहीराज, कसया, पडरौना, खड्डा सहित जिला समाज कल्याण अधिकारी मौजूद रहे। समिति ने चार मामलों की सुनवाई की, लेकिन चर्चा सिर्फ चार फाइलों तक सीमित नहीं रही। बैठक में प्रशासनिक व्यवस्था पर भी अप्रत्यक्ष सवाल खड़े हुए कि आखिर इतने विवादित मामले पैदा कैसे हो रहे हैं?
डीएम ने संबंधित तहसीलदारों को निर्देश देते हुए कहा कि जाति प्रमाण पत्र से जुड़े मामलों में “ऊपरी रिपोर्ट” नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक स्थिति का गहन स्थलीय सत्यापन किया जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि आवेदक की वैवाहिक स्थिति, पारिवारिक पृष्ठभूमि, सामाजिक पहचान और स्थानीय स्वीकार्यता को ध्यान में रखकर ही निर्णय लिया जाए।
दरअसल, अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि कुछ मामलों में बिना ठोस जांच के जाति प्रमाण पत्र जारी कर दिए जाते हैं, जबकि कई वास्तविक पात्र महीनों तहसीलों के चक्कर काटते रहते हैं। इसी पृष्ठभूमि में डीएम का यह बयान काफी अहम माना जा रहा है कि यदि आवेदन स्वीकृत या निरस्त किया जाए तो उसका स्पष्ट और तथ्यात्मक कारण भी दर्ज किया जाए। यानी अब “फाइल दब गई”, “रिपोर्ट नहीं आई” और “ऊपर से आदेश है” जैसे बहाने शायद ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाएंगे।
बैठक में डीएम ने जनता दर्शन और समाधान दिवस में जाति प्रमाण पत्र संबंधी शिकायतों की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी अप्रत्यक्ष नाराजगी जताई। उन्होंने साफ कहा कि यह निर्धारित प्रक्रिया नहीं है। यदि किसी को जाति प्रमाण पत्र जारी न होने पर शिकायत करनी है या किसी दूसरे के प्रमाण पत्र पर आपत्ति है, तो उसे निर्धारित प्रारूप पर जनपदीय सत्यापन समिति के समक्ष अपील करनी होगी।
डीएम ने अपील की पूरी व्यवस्था भी स्पष्ट की। जनपदीय समिति के फैसले से असंतुष्ट व्यक्ति मंडलीय समिति, फिर राज्य स्तरीय समिति और अंततः उच्च न्यायालय तक जा सकता है।
प्रशासन की इस सख्ती के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि तहसीलों में वर्षों से “जाति प्रमाण पत्र उद्योग” की तरह चल रहे कथित खेल पर वास्तव में लगाम लगती है या फिर आदेश सिर्फ बैठकों की फाइलों में ही सीमित रह जाते हैं।
