

विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से अमित कुमार कुशवाहा विशेष संवाददाता
“वायरल खबर से टूटी प्रशासन की नींद! बहादुरपुर से बिहार बॉर्डर तक बालू ट्रकों की कतार, माफियाओं पर कार्रवाई या नौटंकी?”
कुशीनगर। जिले में अवैध बालू परिवहन और कथित “इंट्री सिस्टम” को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल हुई खबर ने आखिरकार प्रशासनिक गलियारों में ऐसी हलचल मचाई कि बहादुरपुर चौकी क्षेत्र में अचानक सख्ती का पहरा बैठ गया। डीएम और एसपी के निर्देश के बाद शुरू हुई कार्रवाई ने उन रास्तों पर भी सन्नाटा ला दिया, जहां अब तक बालू से लदे ट्रकों के पहिए बेखौफ दौड़ते दिखाई देते थे।
बहादुरपुर चौकी पर लगाए गए ट्रैकिंग सेंसर कैमरों की निगरानी के बीच बिहार के बथना तक हाईवे किनारे खड़ी सैकड़ों ट्रकों की कतारें अब खुद कई सवालों का जवाब मांग रही हैं। सड़क किनारे घंटों नहीं, बल्कि चौबीस घंटे से अधिक समय से खड़ी बालू लदी गाड़ियों ने पूरे खेल की परतें खोलनी शुरू कर दी हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर सभी ट्रकों के पास वैध रवन्ना, ई-वे बिल और परिवहन संबंधी कागजात मौजूद हैं, तो आखिर ये गाड़ियां रात-दिन सड़क किनारे क्यों खड़ी हैं? क्या वैध दस्तावेज होने के बावजूद प्रशासनिक जांच का डर है, या फिर मामला सिर्फ कागजों का नहीं बल्कि “सेटिंग सिस्टम” का है?
सूत्र बताते हैं कि लंबे समय से कथित तौर पर एक “इंट्री नेटवर्क” के जरिए चुनिंदा गाड़ियों को आसानी से पार कराया जा रहा था। कहा जा रहा है कि किस ट्रक को कब निकलना है और किसे कितनी देर रोकना है, इसका पूरा खेल पर्दे के पीछे से संचालित होता था। लेकिन देर रात हुई मुकदमे की कार्रवाई ने इस नेटवर्क में ऐसा हड़कंप मचाया कि कई ट्रकों के पहिए वहीं थम गए।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक खबर वायरल नहीं हुई थी, तब तक सब कुछ “सिस्टम के हिसाब” से चल रहा था। मगर जैसे ही मामला सोशल मीडिया पर तूल पकड़ने लगा, वैसे ही कार्रवाई की मशीनरी भी अचानक एक्टिव हो गई। अब लोग कटाक्ष करते हुए कह रहे हैं कि “कुशीनगर में कानून कैमरे से नहीं, वायरल खबर से जागता है।”
फिलहाल प्रशासन की सख्ती से संदिग्ध तरीके से चल रही कथित इंट्री व्यवस्था पर रोक लगती दिखाई दे रही है। हालांकि जनता की निगाह अब इस बात पर टिकी है कि यह अभियान सिर्फ कुछ दिनों का दिखावटी एक्शन साबित होगा या फिर बालू माफियाओं पर वास्तव में लगातार शिकंजा कसा जाएगा।
क्योंकि कुशीनगर की जनता अब यह समझ चुकी है कि सड़क किनारे खड़ी ट्रकों की कतारें सिर्फ बालू नहीं ढो रहीं, बल्कि सिस्टम की खामोशी और सवालों का बोझ भी साथ लेकर चल रही हैं।
