
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता अमित कुमार कुशवाहा की खास रिपोर्ट
कुशीनगर जनपद का तमकुहीराज तहसील क्षेत्र इन दिनों कथित “कागजी फर्मों” के नेटवर्क को लेकर चर्चाओं के केंद्र में है। सूत्रों की मानें तो यहां स्क्रैप कारोबार की आड़ में ऐसा खेल चल रहा है, जिसमें जमीन पर कुछ नहीं, लेकिन कागजों में करोड़ों का कारोबार दौड़ रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर बिना दुकान, बिना गोदाम और बिना वास्तविक व्यापार के करोड़ों रुपये का ट्रांजैक्शन कैसे हो रहा है?
विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि इस पूरे नेटवर्क का मास्टरमाइंड झारखंड का रहने वाला एक शातिर व्यक्ति बताया जा रहा है, जिसने सीमावर्ती बिहार इलाके को अपना सुरक्षित ठिकाना बना रखा है। चर्चा है कि कानून के शिकंजे से बचने के लिए वह फरारी काट रहा है, जबकि उसके नेटवर्क के लोग तमकुहीराज क्षेत्र में गरीब और अनजान लोगों के नाम पर फर्म खुलवाकर फर्जी कारोबार का जाल फैला रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार “महादेव इंटरप्राइजेज”, “लक्ष्मी इंटरप्राइजेज” और “गोदावरी इंटरप्राइजेज” नाम की तीन फर्में जांच के घेरे में बताई जा रही हैं। दावा किया जा रहा है कि इन फर्मों के नाम पर करोड़ों रुपये का लेनदेन कागजों में दर्शाया गया है, जबकि भौतिक रूप से इनका कोई स्पष्ट अस्तित्व नहीं दिखाई देता। न कोई बड़ा कार्यालय, न गोदाम और न ही कारोबार का कोई मजबूत आधार — फिर भी ट्रांजैक्शन का आंकड़ा आसमान छू रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल जीएसटी विभाग की कार्यप्रणाली पर खड़ा हो रहा है। आखिर बिना सत्यापन के ऐसे फर्मों का पंजीकरण कैसे हो गया? क्या विभागीय मिलीभगत के बिना करोड़ों का “कागजी कारोबार” संभव है? या फिर जिम्मेदार अधिकारियों की आंखों पर सिस्टम की ऐसी पट्टी बंधी है, जिसमें सिर्फ फाइलें दिखाई देती हैं और जमीन की सच्चाई गायब हो जाती है?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि निष्पक्ष और गहन जांच हुई तो तमकुहीराज क्षेत्र में कई और फर्जी फर्मों का खुलासा हो सकता है। चर्चाएं तो यहां तक हैं कि यह खेल सिर्फ स्क्रैप कारोबार तक सीमित नहीं, बल्कि टैक्स चोरी और फर्जी बिलिंग के बड़े नेटवर्क से जुड़ा हो सकता है।
अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार विभाग इस मामले को गंभीरता से लेकर भौतिक सत्यापन और वित्तीय जांच कराता है या फिर करोड़ों के इस “कागजी साम्राज्य” पर हमेशा की तरह फाइलों की धूल ही जमती
