
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर | विशेष संवाददाता
कुशीनगर में नर्गिस खातून की मौत का मामला अब केवल चिकित्सकीय लापरवाही तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला अब अस्पताल प्रबंधन की जवाबदेही, आयुष्मान भारत योजना की पारदर्शिता और मरीजों से लिए जाने वाले कथित शुल्क के बड़े सवालों में बदलता जा रहा है। जिस परिवार के घर में मातम पसरा हुआ है, उसी परिवार के सामने अब एक ऐसा सवाल खड़ा हो गया है, जिसका जवाब शायद अस्पताल के रिकॉर्ड, आयुष्मान पोर्टल और जांच रिपोर्ट ही दे पाएगी।
मृतका नर्गिस खातून के पति मोहम्मद तसनीम कौसर ने जिलाधिकारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी एवं अन्य उच्चाधिकारियों को दिए गए शिकायती पत्र में गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उनकी पत्नी के पित्त की थैली के ऑपरेशन के नाम पर लूना अस्पताल द्वारा उनसे लगभग तीस हजार रुपये जमा कराए गए थे। लेकिन पत्नी की मौत के बाद जब मोबाइल पर संदेश आने लगे तो उन्हें पता चला कि आयुष्मान भारत योजना के तहत भी मरीज का पंजीकरण और क्लेम प्रक्रिया पूरी की गई थी।
यहीं से कहानी ने नया मोड़ ले लिया। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि इलाज आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत किया जा रहा था तो परिजनों से तीस हजार रुपये किस आधार पर लिए गए? और यदि निजी भुगतान के आधार पर इलाज हो रहा था तो फिर आयुष्मान क्लेम क्यों किया गया? आखिर मरीज एक ही थी, इलाज एक ही था, लेकिन भुगतान की दो-दो व्यवस्थाएं कैसे चल रही थीं?
परिवार का आरोप है कि उनकी जानकारी और स्पष्ट सहमति के बिना आधार कार्ड और मोबाइल नंबर का इस्तेमाल कर आयुष्मान योजना की प्रक्रिया पूरी की गई। यदि जांच में यह आरोप सही साबित होते हैं तो मामला केवल लापरवाही का नहीं बल्कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर सकता है।

एक तरफ घर में मौत का मातम है, दूसरी तरफ पैसों और क्लेम का हिसाब-किताब चर्चा का विषय बना हुआ है। परिजनों का दर्द यह है कि जिस अस्पताल में वह जीवन बचाने की उम्मीद लेकर पहुंचे थे, वहां से उन्हें मौत की खबर मिली और उसके बाद मोबाइल पर आए संदेशों ने नई शंकाओं को जन्म दे दिया। सवाल यह भी है कि क्या परिजनों को आयुष्मान योजना के तहत इलाज किए जाने की जानकारी दी गई थी? क्या उनसे लिए गए तीस हजार रुपये की रसीद उपलब्ध है? यदि है तो किस मद में धनराशि ली गई? और यदि नहीं है तो फिर यह राशि किस आधार पर जमा कराई गई?
स्वास्थ्य विभाग के सामने अब चुनौती केवल यह पता लगाने की नहीं है कि ऑपरेशन थिएटर के भीतर क्या हुआ और नर्गिस की मौत कैसे हुई, बल्कि यह भी जांचना होगा कि इलाज से लेकर भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुरूप थी या नहीं।
फ्लैशबैक पर नजर डालें तो एक जून 2026 को कसया निवासी नर्गिस खातून को पित्त की थैली में पथरी के ऑपरेशन के लिए लूना अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों के अनुसार दो जून की सुबह उन्हें ऑपरेशन के लिए ओटी में ले जाया गया। आरोप है कि कुछ देर बाद उनकी हालत गंभीर बताकर दूसरे अस्पताल रेफर कर दिया गया, जहां बाद में उनकी मौत की पुष्टि हुई। घटना के बाद अस्पताल परिसर में हंगामा हुआ, पुलिस पहुंची और परिजनों ने चिकित्सकीय लापरवाही का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की थी।
अब जांच का दायरा और व्यापक हो चुका है। सवाल उठ रहे हैं कि ऑपरेशन की अनुमति किसने दी? उस समय ड्यूटी पर कौन चिकित्सक मौजूद था? मरीज की स्थिति बिगड़ने पर रेफर करने का निर्णय किसने लिया? परिजनों को क्या जानकारी दी गई? और सबसे महत्वपूर्ण, आयुष्मान योजना के तहत क्लेम की प्रक्रिया किसके निर्देश पर पूरी कराई गई?
कटाक्ष यह है कि यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ था तो फिर इतने सवाल आखिर पैदा क्यों हो रहे हैं? यदि इलाज पूरी तरह पारदर्शी था तो भुगतान और क्लेम की दोहरी कहानी सामने क्यों आई? और यदि कोई गड़बड़ी नहीं हुई तो फिर परिजनों को अपने ही मरीज के इलाज की वास्तविक स्थिति जानने के लिए अधिकारियों के दरवाजे क्यों खटखटाने पड़ रहे हैं?
फिलहाल पूरा मामला जांच के दायरे में है और अंतिम सच जांच रिपोर्ट के बाद ही सामने आएगा। लेकिन इतना जरूर है कि नर्गिस खातून की मौत अब केवल एक मेडिकल केस नहीं रह गई है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा बन चुकी है, जहां अस्पतालों से जवाब मांगे जा रहे हैं और परिवार अब सिर्फ एक सवाल का जवाब चाहता है—”नर्गिस की मौत कैसे हुई और उनके नाम पर आखिर किस बात का भुगतान लिया गया?”
