


विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर
विशेष संवाददाता
प्रयागराज और कुशीनगर से जुड़े दो अलग-अलग मामलों ने राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली पर ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं जिनके जवाब तलाशना अब केवल शिकायतकर्ताओं की जरूरत नहीं, बल्कि जनता के विश्वास की भी परीक्षा बन चुका है। एक ओर तहसील मेजा में भूमि विवाद से जुड़े मुकदमों के निस्तारण को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं, वहीं दूसरी ओर एक जांच रिपोर्ट में तत्कालीन तहसीलदार पर प्रथम दृष्टया भ्रामक तथ्य प्रस्तुत करने और शिकायतों के निस्तारण में लापरवाही के आरोपों के बावजूद पदोन्नति की प्रक्रिया चर्चा का विषय बन गई है।
मेजा तहसील के मामले में शिकायतकर्ता ने राजस्व परिषद के समक्ष जो तथ्य रखे हैं, वे यदि जांच में सही साबित होते हैं तो यह केवल एक प्रशासनिक त्रुटि नहीं बल्कि राजस्व न्यायालयों की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न होगा। आरोप है कि ग्राम अकबरपुर की भूमि से जुड़े कई वादों में 8 नवंबर 2024 को आदेश पारित कर दिए गए, जबकि संबंधित पत्रावलियों में न्यायालय की मूल ऑर्डरशीट तक उपलब्ध नहीं बताई जा रही है।
राजस्व न्यायालयों में किसी भी वाद की सुनवाई, तिथि निर्धारण, पक्षकारों की उपस्थिति तथा आदेश की प्रक्रिया न्यायिक रिकॉर्ड का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। लेकिन शिकायत के अनुसार सीसीएमएस पोर्टल पर वादों का सारांश तो मौजूद है, जबकि आवश्यक न्यायिक अभिलेखों का अभाव दिखाई दे रहा है। सवाल उठता है कि यदि कार्यवाही हुई तो उसका रिकॉर्ड कहां है, और यदि रिकॉर्ड नहीं है तो आदेश किस आधार पर पारित हुए?
मामले का सबसे रहस्यमय पहलू वह प्रविष्टि है जिसमें जिन वादों का निस्तारण 8 नवंबर 2024 को दर्शाया गया, उन्हीं मामलों में 30 नवंबर 2024 की अगली तिथि भी अंकित दिखाई दे रही है। प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर किसी निस्तारित मुकदमे में अगली सुनवाई की तारीख कैसे दर्ज हो सकती है? क्या यह तकनीकी त्रुटि है, डेटा प्रविष्टि की गलती है या फिर कुछ और?
राजस्व परिषद तक पहुंची शिकायत के बाद अब अभिलेखों और पोर्टल की प्रविष्टियों का परीक्षण किया जा रहा है। यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो यह मामला केवल मेजा तहसील तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे राजस्व न्यायालय तंत्र में रिकॉर्ड प्रबंधन और न्यायिक पारदर्शिता की समीक्षा की मांग को जन्म दे सकता है।
उधर कुशीनगर में एक अन्य प्रकरण ने प्रशासनिक जवाबदेही पर नई बहस छेड़ दी है। जांच रिपोर्ट में तत्कालीन तहसीलदार पर प्रथम दृष्टया गलत तथ्यों को प्रस्तुत करने, शिकायतों के निस्तारण में अपेक्षित सावधानी न बरतने तथा उच्चाधिकारियों को भ्रामक जानकारी उपलब्ध कराने जैसे आरोप सामने आए हैं। हालांकि अंतिम निर्णय सक्षम प्राधिकारी द्वारा ही लिया जाना है, लेकिन जांच में उठे सवालों ने स्थानीय स्तर पर अनेक चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह उठ रहा है कि यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध गंभीर शिकायतें और जांच संबंधी टिप्पणियां मौजूद थीं, तो पदोन्नति की प्रक्रिया के दौरान इन तथ्यों की समीक्षा किस स्तर पर हुई? क्या संबंधित सूचनाएं उपलब्ध नहीं थीं, या उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें महत्व नहीं दिया गया? यह सवाल केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी प्रशासनिक निगरानी प्रणाली की कार्यक्षमता से जुड़ा हुआ है।
ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि एक साधारण नागरिक की छोटी सी त्रुटि पर तत्काल कार्रवाई हो जाती है, लेकिन जब मामला अधिकारियों की जवाबदेही का आता है तो जांच, फाइल और प्रक्रिया की लंबी यात्रा शुरू हो जाती है। यही कारण है कि जनता के बीच यह चर्चा तेज है कि यदि किसी मामले में प्रथम दृष्टया दोष की बात सामने आती है तो उसके बाद जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी और पारदर्शी है।
राजस्व प्रशासन का मूल उद्देश्य भूमि विवादों का निष्पक्ष समाधान, न्यायालयीय आदेशों का पालन और जनता की शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण है। लेकिन जब रिकॉर्ड, आदेश, पोर्टल प्रविष्टियों और जांच रिपोर्टों को लेकर प्रश्न उठने लगें, तो स्वाभाविक रूप से जनता का भरोसा प्रभावित होता है। यही कारण है कि अब लोग केवल जांच रिपोर्ट नहीं, बल्कि उसके बाद होने वाली कार्रवाई को भी देखना चाहते हैं।
फिलहाल दोनों मामलों में अंतिम निष्कर्ष सामने आना बाकी है। जांच जारी है और संबंधित अधिकारियों को अपना पक्ष रखने का अवसर भी प्राप्त है। लेकिन इतना तय है कि इन घटनाओं ने राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली, निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही तंत्र पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
अब निगाहें शासन, राजस्व परिषद और उच्च प्रशासनिक अधिकारियों पर टिकी हैं। जनता जानना चाहती है कि क्या सवालों के जवाब मिलेंगे, क्या जिम्मेदारी तय होगी, क्या व्यवस्था में सुधार होगा या फिर ये मामले भी सरकारी फाइलों के विशाल गलियारों में खोकर रह जाएंगे।
क्योंकि सवाल केवल एक आदेश, एक फाइल या एक पदोन्नति का नहीं है—सवाल उस भरोसे का है, जिसके सहारे आम नागरिक न्याय और प्रशासन की चौखट तक पहुंचता है।
