
न्याय की कुर्सी पर बैठा अधिकारी बना जमीन का लाभार्थी? राजस्व विभाग की साख पर सबसे बड़ा सवाल
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। जनपद की कप्तानगंज तहसील इन दिनों एक ऐसे सनसनीखेज भूमि विवाद को लेकर सुर्खियों में है, जिसने पूरे राजस्व महकमे की कार्यप्रणाली पर सवालों का पहाड़ खड़ा कर दिया है। तहसीलदार चंदन शर्मा पर लगे आरोप इतने गंभीर हैं कि तहसील परिसर से लेकर गांव की चौपालों तक एक ही चर्चा गूंज रही है—“क्या अब न्याय की कुर्सी भी जमीन के सौदों का अड्डा बन चुकी है?”
आरोप है कि तहसीलदार चंदन शर्मा ने करोड़ों रुपये कीमत की विवादित भूमि के मामले में अपने अधिकारों का खुला दुरुपयोग करते हुए ऐसा फैसला सुनाया, जिससे सीधे तौर पर उनकी मां श्रीमती निर्मला शर्मा को लाभ पहुंचा। बताया जा रहा है कि जिस भूमि विवाद पर तहसीलदार ने न्यायिक आदेश पारित किया, उसी भूमि के हिस्से का बैनामा बाद में उनकी मां के नाम करा लिया गया। इस खुलासे के बाद पूरे जिले में हड़कंप मच गया है।
मामला केवल जमीन खरीदने तक सीमित नहीं है, बल्कि आरोपों का सबसे विस्फोटक पहलू यह है कि बैनामा होने के महज 15 दिनों के भीतर नामांतरण आदेश भी पारित कर दिया गया। सामान्य परिस्थितियों में राजस्व विभाग में नामांतरण की प्रक्रिया लंबी जांच, आपत्तियों और सत्यापन से गुजरती है, लेकिन यहां फाइल मानो “रॉकेट की रफ्तार” से दौड़ती चली गई। यही वजह है कि अब पूरे घटनाक्रम को पहले से तय पटकथा बताया जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक संबंधित भूमि को लेकर वर्षों से विवाद चल रहा था और मामला राजस्व न्यायालय में विचाराधीन था। स्थानीय लोगों का आरोप है कि तहसीलदार ने उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता-2006 की प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर एकपक्षीय आदेश पारित किया और बाद में उसी जमीन से जुड़ा सौदा अपने परिवार के पक्ष में करा लिया। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब न्याय देने वाला अधिकारी खुद ही लाभार्थी बन जाए, तब आम आदमी आखिर न्याय की उम्मीद किससे करे?
कप्तानगंज तहसील में इस मामले को लेकर जबरदस्त आक्रोश देखने को मिल रहा है। लोग खुलकर कह रहे हैं कि यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की “हत्या” है। ग्रामीणों का कहना है कि अब तहसील में फैसले कानून की किताब देखकर नहीं, बल्कि जमीन की कीमत देखकर किए जाएंगे। कई लोगों ने इसे “सरकारी कुर्सी पर बैठकर निजी साम्राज्य खड़ा करने” की कोशिश करार दिया है।
बताया जा रहा है कि इस पूरे मामले को लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय, राजस्व परिषद और उच्चाधिकारियों तक शिकायत भेजी गई है। शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि तहसीलदार ने अपने पद की ताकत का इस्तेमाल कर नियमों को कुचलते हुए पूरे खेल को अंजाम दिया। लोगों ने मांग की है कि मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए ताकि प्रशासनिक व्यवस्था में जनता का विश्वास बचा रह सके।
मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया जब जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर ने स्वयं स्वीकार किया कि कप्तानगंज तहसील में कुछ जमीनों की खरीद-फरोख्त में स्थानीय तहसीलदार की भूमिका सामने आई है। जिलाधिकारी ने कहा कि पूरे प्रकरण की जांच के लिए एसडीएम हाटा को जांच अधिकारी नामित कर दिया गया है। डीएम के इस बयान के बाद साफ हो गया कि मामला केवल अफवाह नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर गंभीरता से लिया जा रहा है।
हालांकि तहसीलदार चंदन शर्मा का विवादों से यह पहला नाता नहीं बताया जा रहा। इससे पहले तमकुहीराज तहसील में तैनाती के दौरान भी उन पर कई गंभीर आरोप लग चुके हैं। उस समय भी राजस्व मामलों में पक्षपात, दबाव और नियमों की अनदेखी जैसे आरोप लगे थे, लेकिन मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला गया। अब कप्तानगंज में उठे इस नए बवंडर ने पुराने आरोपों को फिर जिंदा कर दिया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते ऐसे मामलों पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो आम जनता का राजस्व विभाग से भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा। गांवों में लोग तंज कसते हुए कह रहे हैं कि “अब जमीन का फैसला अदालत में नहीं, संपर्क और सौदेबाजी से होगा।” तहसील परिसर में भी कर्मचारियों और वादकारियों के बीच यह मामला चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
राजनीतिक गलियारों में भी इस मुद्दे ने हलचल तेज कर दी है। विपक्षी दलों से जुड़े स्थानीय नेताओं ने इसे “भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा” बताते हुए सरकार और प्रशासन को कठघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया है। वहीं सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि जांच केवल औपचारिकता बनकर न रह जाए, बल्कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जाए।
कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो यह मामला केवल विभागीय अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हितों के टकराव, पद के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत भी गंभीर अपराध माना जा सकता है। ऐसे मामलों में निष्पक्षता प्रशासन की सबसे बड़ी कसौटी होती है, और यदि उसी पर सवाल उठ जाएं तो पूरी व्यवस्था कटघरे में खड़ी हो जाती है।
फिलहाल पूरे जिले की निगाहें अब जांच पर टिकी हुई हैं। जनता यह जानना चाहती है कि क्या शासन-प्रशासन इस मामले में सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई करेगा या फिर यह प्रकरण भी अन्य विवादों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा। लेकिन इतना तय है कि कप्तानगंज तहसील में उठा यह “जमीन घोटाले का तूफान” आने वाले दिनों में राजस्व विभाग के कई चेहरों से नकाब हटाने का काम कर सकता है।
